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सनातन संस्कृति पर्यावरणीय दायित्व सिखाती है : प्रो पल्लवी / Shivpuri News

संघ की मातृशक्ति ने आयोजित की ई संगोष्ठी

शिवपुरी। विश्व पर्यावरण दिवस पर आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मातृशक्ति शाखा द्वारा ई संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय महिलाओं ने भाग लिया।ई संगोष्ठी को संबोधित करते हुए अंग्रेजी की सहायक प्राध्यापक श्रीमती पल्लवी शर्मा गोयल ने स्थानीय परिवेश में परिवार केंद्रित पर्यावरणीय भूमिका पर प्रबोधन किया।ई संगोष्ठी का संयोजन आरएसएस के सह जिला संघचालक डॉ गोविंद सिंह ने किया।

प्रो. पल्लवी ने कहा कि पर्यावरण के प्रति सम्मान और उसकी उसकी शाश्वतता सृष्टि के आरम्भ से विद्यमान रही है। सनातन संस्कृति में प्रकृति को सदैव देवतुल्य इसलिए माना गया है क्योंकि हमारी परंपरा और जीवन दृष्टि चेतना को बहुत ही प्रमाणिकता के साथ अधिमान्यता देती रही है।

 

उन्होंने कहा कि जो जड़ है उसे भी अनुपयोगी नही मानते है प्रकृति में समाहित चेतना जीव की चेतना से कमतर नही मानी गई है।प्रो पल्लवी ने मानस को उध्दृत करते हुए कहा कि जब सीता जी का रावण ने छलपूर्वक हरण कर लिया था तब रामजी ने व्रक्ष, लता और जंगल के अन्य प्राणियों से सीता जी का पता पूछा है। यह सन्देश है हमारी जीवन दृष्टि के लिए की हम प्रकृति से अलग नही होकर उसका ही अविभाज्य अंग है।उन्होंने कहा कि हमें संकल्प लेना चाहिए कि हर बर्ष कमसे कम एक पौधे का रोपण और उसके जैविकीय समतुल्य लालन पालन की जबाबदेही धारण करें।उन्होंने बताया कि आज के वैश्विक पर्यावरणीय संकट मानवीय जीवन में कर्तव्य और नैतिक न्यूनता की उपज है। हम गंगा या नर्मदा को दैनिक पूजा पाठ में देवतुल्य स्मरण करते है लेकिन व्यवहार में उनका दैवीय सम्मान नही कर पाते है।इसलिए हर व्यक्ति इकाई पर पर्यावरणीय चेतना को परिवार चेतना के भाव के साथ सयुंक्त करने की आज महती आवश्यकता है।

संगोष्ठी का संयोजन करते हुए पूर्व सिविल सर्जन डॉ गोविंद सिंह ने कहा कि कोरोना संकट में हमने आक्सीजन की किल्लत को नजदीक से भोगा है लेकिन दनोदिन व्यवहार में प्रकृति प्रदत्त शुद्ध आक्सीजन को हमने अपने ही कर्मों से दूषित किया है। डॉ. सिंह ने पर्यावरण सरंक्षण को सरकार से इतर निजी जीवन में सन्नहित कर्तव्य पालन के साथ जोड़ा। ई संगोष्ठी में जुड़ी सभी महिलाओं का आभार प्रदर्शन गुंजन शर्मा ने किया।

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