खनियाधाना – खनियांधाना नगर मे विराजमान गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज जी के परम शिष्य ओजस्वी बक्ता 108 मुनि श्री विषोक सागर जी महाराज एवं 108 मुनि श्री विघेय सागर जी महाराज जी का वर्षा योग श्री 1008 पार्ष्वनाथ दिगम्बर जैन बडा मंदिर जी में चल रहा है । मुनि श्री विशोक सागर जी महाराज जी के द्वारा अनावरत ज्ञान धारा का प्रवहान किया जा रहा है ।इसमें अनेक भव अवहान का अपने जीवन को सुधारनें का प्रयास कर रहे है ।पूज्यनीय मुनि श्री ने कहा कि किसी भी अनुष्ठान पूजन भक्ति आदि की सार्थकता तव है जब उससे षिक्षा लेकर हम अपने जीवन शैली में सुधार करें ।आज अधिकांष आयोजन केवल दिखावा बनते जा रहें है।कभी हममें सोचा तक नहीं कि हमारें मनीषियों में अपनी साधना से बहार आकर अपनें अमूल्य समय में से समय निकाल कर प्राणियों से सुखार्थं धर्म ग्रंथों को लिपिबद्ध किया ।इन ग्रथों के अनुसार ही हम अपनें -2 धर्म क्षेत्रों में कार्यरत है। लेकिन हम उनकी भावनाओं को उनके उद्देष्य को उनसे मिलने वाली शिक्षाओं तिलांजलि देकर अपनी निजी आन बान और शान के प्रदर्शन का माध्यम बना रहे हैं। अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये हम धर्म प्रभावना की जगह अप्रभावना होने से भी नहीं डर रहें है। पूज्य मुनि श्री ने कहा कि अनुष्ठान के लिये विघि द्रव्य क्षेत्र काल तो आवष्यक है ही लेकिन सबसे आवष्यक भाव । समता एवं क्षमा भाव से किया गया आयोजन अनुष्ठान दान पूजन आदि क्रियायें ऊर्ध्व गति को देने वाली है।जितना समय अनुकूल हो जितनी शक्ति एंव सामर्थ्य हो उतना बडचड कर अनुष्ठान करे लेकिन कुछ समय चिन्तन मनन को अवस्य निकालें अनुष्ठान धार्मिक क्रिया द्वारा हमारे मनीषि हमे क्या शिक्षा दे रहे है। हमारे ग्रहण करने योग्य एंव त्यागने योग्य क्या है हम अपने जीवन मे कितना चारितार्थ कर पा रहे है। जरा सी प्रतिकूलताओं मे हम अपना आपा खो देते है। आज जो कुछ भी हम वाहय मे सुख या दुख प्राप्त हो रहा है अनुकूलताओ अथवा प्रतिकूलताओ का वेदन कर रहे है। इसमे व्यक्ति द्वारा जिम्मेदार नही । मे व्यर्थ मे ही दूसरो को इनका कर्ता मान कर पुन: कर्म मे बंध कर रहाहूँ।




