काशी सबसे पौराणिक नगर है। यहाँ भगवान विश्वनाथ बिराजते हैं। गंगा उनके पग पखारती है। भगवान विश्वनाथ के मंदिर प्रांगण में ही एक मस्जिद भी है। वर्षों से। कहते हैं यह मंदिर तोडकर उसी की सामग्री से बनाई गई थी।
यह भी कहा जाता है कि इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि बड़े विशालकाय नंदी अब भी ज्ञानवापी मस्जिद की तरफ़ मुँह करके खड़े हैं। तर्क यह दिया जाता है कि अगर उधर मंदिर नहीं होता तो नंदी का मुँह उधर ही क्यों होता भला?
बहरहाल, बुधवार को कोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद के भीतर तहख़ाने में पूजा की अनुमति दे दी है। इस तहख़ाने को व्यास जी का तहख़ाना कहा जाता है। मुस्लिम पक्ष इसका विरोध करता है। उसका कहना है कि व्यास जी के परिवार ने यहाँ कभी पूजा की ही नहीं।
जबकि हिंदू पक्ष कहता है कि 31 साल पहले यानी 1993 तक यहाँ व्यास जी का परिवार पूजा करता रहा। 1993 में व्यास जी को यहाँ पूजा करने से रोक दिया गया। व्यास वंशावली में प्रमाण मिलता है कि सबसे पहले 1551 में सतानंद व्यास इस मंदिर में पूजा किया करते थे। इसके बाद उनके परिवार ने यह परम्परा आगे बढ़ाई।
ज्ञानवापी कैंपस में नंदी की प्रतिमा के सामने बने तहखाने को ही व्यास तहखाना कहा जाता है।
1930 में इस व्यास पीठ पर बैजनाथ व्यास थे। बैजनाथ व्यास का कोई बेटा नहीं था। उनके बाद उनकी बेटी राजकुमारी के बेटों ने पूजा की इस परम्परा को आगे बढ़ाया। 1993 तक राजकुमारी के बेटे पूजा करते रहे। फिर पूजा बंद हो गई।
राजकुमारी के बेटे सोमनाथ व्यास का 1920 में निधन हो गया। तब उनकी बेटी उषा रानी के बेटे शैलेंद्र कुमार ने कोर्ट में याचिका दायर कर व्यास जी के तहख़ाने में पूजा की अनुमति माँगी। इसी याचिका पर बुधवार को कोर्ट ने पूजा की अनुमति दी और कलेक्टर के आदेश दिया कि वे सात दिन के भीतर पुजारी तय करें और पूजा शुरू करवाएँ।
इसके पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ( एएसआई) की रिपोर्ट भी सार्वजनिक हो चुकी है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मस्जिद के भीतर भगवान विष्णु और गणेश की मूर्ति तथा शिवलिंग भी मिला है। रिपोर्ट में पूरे परिसर को मंदिर के स्ट्रक्चर पर खड़ा हुआ बताते हुए कोई 34 सबूतों का ज़िक्र किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार ज्ञानवापी मस्जिद के भीतर महामुक्ति मंडप नाम का एक शिलापट्ट भी मिला है। रिपोर्ट के अनुसार औरंगजेब के शासन के दौरान मंदिर के स्ट्रक्चर को तोड़कर उसके स्वरूप को बदला गया होगा।
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