शिवपुरी: कहते हैँ की सफलता यूं ही रातों-रात नहीं मिलती। मेहनत तो करनी ही पड़ती है, लेकिन जब बात महिलाओं की आती है, तो उसे मेहनत के साथ कई विरोध भी झेलने पड़ते हैं। शिवपुरी की प्रियंका चतुर्वेदी की बात करें तो इन्होंने संघर्ष कर खुद अपनी राह चुनी। शिवपुरी के माधव नेशनल पार्क में पहली महिला फॉरेस्ट गाइड बनी प्रियंका को ट्रेनिंग में तो परेशानी नहीं हुई, लेकिन ड्यूटी पानी के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा।
प्रियंका चतुर्वेदी ने बताया कि जॉब भी आसान नहीं थी। परिवार वालों को समस्या तो नहीं थी, लेकिन गाइड की नौकरी के लिए मनाना इतना आसान भी नहीं रहा। रागिनी फाउंडेशन के माध्यम से परिजनों को मनाने में कामयाबी मिली। फॉरेस्ट गाइड की 2 महीने की ट्रेनिंग के बाद शिवपुरी के माधवगढ़ नेशनल पार्क में ड्यूटी लग गई।
पहली महिला गाइड होने के कारण मेल गाइड सहज नहीं थे। वह मुझे ड्यूटी देने के पक्ष में नहीं थे। पहले दिन विरोध हुआ। किसी ने बात तक नहीं की। दूसरे दिन भी ऐसा ही हुआ। मायूसी भी हुई, लेकिन मैं भी पीछे नहीं हटी। इसी तरह 4 दिन बीत गए, लेकिन ड्यूटी नहीं लगी। इसके बाद आखिरकार वह पल आ गया, जिसके लिए मैं यहां थी। पहली बार टूरिस्ट को जंगल सफारी पर ले गई। वह पल मेरी जिंदगी का सबसे अहम पल था। मैं आत्मनिर्भर थी। अब मेल गाइड भी समझ गए थे कि मैं ऐसे ही यहां से नहीं जाने वाली।
शायद मेरे ना हारने की जिद ने मुझे सफलता दिलाई, लेकिन इसमें अकेली की मेहनत नहीं है। इसके पीछे एनजीओ की मैडम दीपा दीक्षित, परिजनों और अन्य लोगों का सपोर्ट भी मिला। करियर में परेशानी आती है, लेकिन जो हार नहीं मानते, वही सफलता पाते हैं।
फाइनेंस की जॉब छोड़ यह करियर अपना
प्रियंका बताती हैं कि पहले फाइनेंस की जॉब करती थी। टीचर का भी जॉब किया, लेकिन कोरोना में जॉब छोड़ दी। उसके बाद फॉरेस्ट टूरिस्ट गाइड के बारे में पता चला। 2 महीने की ट्रेनिंग ली। जितने भी जॉब किए, उसमें मुझे यह काम करके सबसे अच्छा लगा। इसमें रोमांच है। ड्यूटी एक ही है, लेकिन जिम्मेदारी हर दिन बदलती है। नेशनल पार्क में लेपर्ड ज्यादा है। सीधा सामना, तो कभी नहीं हुआ, लेकिन आजू-बाजू से वह गुजरते रहते हैं। हिरण भी काफी सुंदर है। ड्यूटी की कभी थकान नहीं होती। शनिवार और रविवार को सबसे ज्यादा टूरिस्ट आते हैं।






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