पूर्व कृषि मंत्री शरद पवार के बेटे अजित पवार ने बीते 20 अक्टूबर को कहा था कि बीजेपी बनियों की पार्टी है. इसमें सिर्फ सेठों की चलती है. उन्होंने बीजेपी पर इस समुदाय के हित साधने का आरोप लगाया था.
एक वेबसाइट है ‘कोरा.कॉम’. इस वेबसाइट पर सामान्य जिज्ञासा के सवाल उठाते हैं और लोग जवाब देते हैं. इस वेबसाइट पर एक सीधा सा सवाल पूछा गया ‘वाय डू सम पिपुल कॉल बीजेपी एज ब्राह्मण-बनिया पार्टी (क्यों कुछ लोग भाजपा को ब्राह्मण-बनिया पार्टी कहते हैं). यहां कई लोगों ने इसके जवाब अपने—अपने ढंग से दिए हैं.

थोड़ा और पीछे जाइए और पीएम मोदी का एक बयान सुनिए. 3 मार्च 2014 को बिहार के मुजफ्फरपुर में उन्होंने कहा था ‘मैं देश की समस्याओं का हल खोज रहा हूं और विरोधी मेरा हल ढूंढ़ रहे हैं. बीजेपी बनियों की पार्टी नहीं है, बल्कि बैकवर्ड्स की पार्टी है.’
ये ऊपर दिए गए वाकए बानगी भर हैं. बीजेपी के बारे में यह एक आम धारणा है कि वह बनियों से संचालित होने वाली पार्टी है. उसका हिंदुत्व का एजेंडा इसमें ब्राह्मणों को भी शामिल करता है. लेकिन पीएम मोदी का नोटबंदी का हालिया कदम इस पूरी अवधारणा को तोड़ता है. इसका कारण है कि नोटबंद का विरोध करने वाले ज्यादातर लोगों का तर्क है कि इससे आम बनिया वर्ग, जो ज्यादातर लेन—देन कैश में करता है, वह न सिर्फ पार्टी से छिटकेगा बल्कि उसके विरोध में यूपी का चुनावी माहौल मोड़ने की कोशिश करेगा.
हाल ही में सोनारों पर एक प्रतिशत एक्साइज ड्यूटी लगाते वक्त भी यही कहा गया था कि बनिया वोट बैंक बीजेपी से छिटक जाएगा. उस समय खुद को बैकवर्ड जातियों की पक्षधर बताने वाली कई पार्टियां भी सोनारों के समर्थन में उतर आईं थीं.
आम आदमी पार्टी और राहुल गांधी ने बीजेपी से छिटकते हुए इस वोट बैंक को देखकर उसे हथियाने की पूरी कोशिश उस दौरान भी की थी. हालिया नोटबंदी का मामला तो और भी गंभीर है. देश की बड़ी आबादी कैश में ट्रांजैक्शन करती है. छोटे बनियों से लेकर बड़े आढ़तियों तक. सोनारों से लेकर बिल्डर तक कैश में लेन-देन करते हैं.
पीएम मोदी ने यह फैसला लेकर अपने कोर वोट बैंक पर गहरा आघात किया है. मोदी के निर्णय से उन लोगों में चुप्पी है जो बीजेपी को बनिया पार्टी कहते थे. मोदी के इस निर्णय से उनकी काले धन के प्रति गंभीरता के बारे में भी अंदाजा लगाया जा सकता है. 19 सितंबर को राजस्थान पत्रिका अखबार में एक रिपोर्ट छपी जिसमें कहा गया कि बीजेपी के हाथ से व्यापारी फिसल रहे हैं. यह रिपोर्ट आगरा में व्यापारी सम्मेलन की बैठक के आधार पर लिखी गई थी. इसमें एक साथ कई जिलों के व्यापारियों ने भाजपा के प्रति नाराजगी व्यक्त की थी. व्यापारियों ने एक स्वर में कहा कि बीजेपी उनकी आशाओं पर खरी नहीं उतर रही है.
अब नोट बैन के मसले पर आते हैं. दरअसल, मोदी सरकार को निर्णय लेते समय भी इसकी जानकारी थी कि इससे उसके कोर वोटबैंक पर असर होगा. नोटबंदी के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी जोर देकर कहा था कि ‘कैश के लेन-देन को स्वीकार नहीं किया जाएगा.’
तो उन लोगों को कम से कम इन आरोपों से तो बाज ही आना चाहिए कि बीजेपी अपने सारे निर्णय सिर्फ बनियों को ध्यान में रखकर लेती है. क्योंकि कैश में लेन-देन करने वाला बनिया इस कदम से अगर बीजेपी से नाराज हो जाता है तो यह कदम पार्टी को उल्टा भी पड़ सकता है. बहुत सारे चैनल ऐसे वीडियो चला भी रहे हैं जिसमे छोटे बनिया-व्यापारी अपनी परेशानियां बताते हुए पीएम मोदी की आलोचना कर रहे हैं. तो गुजारिश है उन लोगों से जो बीजेपी को बनिया की पार्टी साबित करने में तुले हैं, जरा सरकार के इन कदमों पर गंभीरता से विचार करें.





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