लोगों को रोजाना 24 घंटे बिजली मुहैया कराने की कोशिश में जुटी है, लेकिन
उपभोक्ताओं को 50-70 पैसे प्रति यूनिट ज्यादा भुगतान की तैयारी कर लेनी
चाहिए।
असल में केंद्र सरकार साल 2009 के बाद लगाए गए पावर प्लांटों
के लिए घरेलू और आयातित कोयले की कीमतें पूल करने का प्रस्ताव लागू करने की
योजना बना रही है। ऐसा करके सरकार ऐसे पावर प्लांटों को ईंधन की निर्बाध
आपूर्ति पक्की करना चाहती है, जो सभी को 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराने की
योजना के लिए अहम हैं।
एक रिपोर्ट में बिजली मंत्रालय के अधिकारियोंके हवाले से कहा गया है कि इस माह के अखिर तक केंद्रीय मंत्रिमंडल घरेलू और
आयातित कोयले की कीमत पूलिंग के मसले पर गौर कर सकता है। वर्ष 2009 के बाद
पावर प्लांटों की उत्पादन क्षमता बढ़ी है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोल
इंडिया इन्हें कोयले की आपूर्ति भी कर रही है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।
इतने कोयले से महज 68 प्रतिशत उत्पादन क्षमता का इस्तेमाल किया जा सकता है।
कीमत पूलिंग की बदौलत पावर प्लांटों को इतना कोयला
दिया जा सकता है, कि वे पूरी उत्पादन क्षमता का 85 प्रतिशत इस्तेमाल कर
सकें। ऐसा करने के बिजली उत्पादन बढ़ेगा और आपूर्ति में इजाफा होगा, लेकिन
लागत में भी बढ़ोतरी हो जाएगी। इसके अलावा प्राकृतिक गैस की कीमत बढ़ने के
कारण गैस आधारित पावर प्लांटों की लागत बढ़ जाएगी, जिसका असर बिजली की कीमत
होना तय है।
साल 2009 के
बाद स्थापित कई पावर प्लांटों को कोयला आपूर्ति की कोई पक्की व्यवस्था (कोल
लिंकेज) नहीं है। ऐसे प्लांटों को भी सरकार की नई योजना से फायदा होगा।
ऊर्जा मंत्रालय को लगता है कि यदि सरकार प्राइस पूलिंग के प्रस्ताव पर
सहमति जताती है तो देश में लगभग 1 लाख करोड़ रुपए की बिजली परियोजनाएं शुरू
हो जाएंगी। इनमें से आधे प्लांट निजी क्षेत्र के हैं और बाकी सार्वजनिक
क्षेत्र के, मुख्य रूप से एनटीपीसी के।
प्राइस
पूलिंग के तहत कोल इंडिया आयातित कोयला खरीदेगी और इसमें घरेलू कोयला
मिलाएगी। चूंकि आयातित कोयले की कीमत घरेलू कोयले के मुकाबले 50 प्रतिशत
अधिक होती है, लिहाजा मिश्रित कोयले के दाम बढ़ जाएंगे। इस वजह से मौजूदा
वित्त वर्ष के बाकी महीनों में बिजली उत्पादन की लागत 75 पैसे प्रति यूनिट
तक बढ़ जाएगी। कोयला मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक इस वजह से साल
2015-16 के दौरान बिजली की कीमत 45-50 पैसे प्रति यूनिट तक बढ़ जाएगी। वर्ष
2016-17 में यह वृद्घि 5-10 पैसे प्रति यूनिट रह जाएगी।
शुरुआती
तौर पर यह स्कीम सीमित प्लांटों के लिए होगी। खास तौर पर ऐसे प्लांटों के
लिए, जिन्होंने बिजली नियामक की तरफ से तय कीमत पर राज्यों के बिजली बोर्ड
के साथ खरीद-फरोख्त का करार किया हुआ है। बाद में इस योजना का लाभ सभी
प्लांटों को दिया जा सकता है।





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