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फाइलों में ही दफन हो गए सहरिया आदिवासियों के तरक्की के दावे आदिवासियों की योजनाओं में धरातल पर अमल नहीं भोजन, आवास और रोजगार की तलाश में भटकता आदिवासी समुदाय

शिवपुरी। प्रदेश की शिवराज सिंह सरकार सहरिया आदिवासी समुदाय के उत्थान व विकास को लेकर आये दिन नये नये दावे करती है। सरकारी फाइलों और विभागीय बैठक में शिवपुरी के सहरिया आदिवासी समुदाय की तरक्की के दावे भले ही संतोषप्रद हों लेकिन यह सच है कि आदिवासियों के नाम पर चलाई जा रही ज्यादातर योजनाएं अपेक्षा के अनुरूप परिणाम नहीं दे पा रही हैं। शासकीय दस्तावेज में सहरिया आदिवासी समुदाय के पोषण, सुरक्षा, रोजगार, चिकित्सा आदि के नाम पर जो बड़ी धनराशि खर्च करना बताया जा रहा है उसकी हकीकत शिवपुरी जिले के आदिवासी बहुल गाँवों का दौरा कर देखी जा सकती है। यह कटु सत्य है कि सहरिया आदिवासियों की हालत सर्वाधिक चिन्ताजनक एवं नाजुक है।

प्राचीन काल  से ही जगंल में रहने वाले सहरिया आदिवासी अब अपना जीवन बचाये रखने के लिए विभिन्न प्रकार की विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष कर रहे हैं। जंगल पर खदान माफिया और जड़ी बूटी माफियाओं की नजर लगी और सरकार ने जगंल में रहने वालों को बेदखल करना शुरू किया तब से जगंल पर आश्रित सहरिया समुदाय के सामने अपनी जान बचाने अपना परिवार बचाये रखने की जिम्मेदारी आ गई है। अब हाल यह है कि सरकार इस समुदाय को कभी नेशनल पार्क की सीमा का हवाला देकर, कभी मड़ीखेड़ा डूब क्षेत्र के विकास की इबारत लिखने की गरज से जगंल से खदेडने में जितनी रूचि ले रही है उतनी इनके भोजन, आवास, रोजगार, उपचार में नहीं लेती। सरकार की इस अनदेखी का परिणाम यह है कि सहरिया समुदाय के लोग जहाँ भी निवास कर रहे हैं, वहाँ वे  भूख, कुपोषण जैसी खतरनाक बीमारी से लड़ते हुए धीरे धीरे अपनी जिदंगी को खत्म कर रहे हैं। जिला मुख्यालय से लगे दर्जनों गाँवों पर निगाह डालें तो यहाँ रहने वाले सहरिया आदिवासियों से लेकर दूर दराज जंगल से लगे गाँवों में निवासरत सहरिया आदिवासियों का हाल एक जैसा है। रोटी रोजगार के अभाव में धीरे धीरे सहरिया समुदाय की पहचान खत्म होने की ओर बढ़ रही है। 

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ज्यादातर बच्चे हो रहे भूख और कुपोषण के शिकार

सहरिया समुदाय के ज्यादातर बच्चे भूख और कुपोषण के बीच रहने से हड्डियों का ढांचा बनकर रह गये है। ये स्थिति सरकार द्वारा चलाये जा रहे पोषण पुर्नवास केन्द्रों, आगंनवाडी केन्द्रों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। कुपोषण को दूर करने के लिए सरकार की ओर से जो पोषण आहार उपलब्ध कराया जाता है वह नियमित और सभी बच्चों को नहीं मिल पा रहा है। ऐसा लगता है कि सहरिया आदिवासी तो भूख, कुपोषण के बीच ही जीवन बिताने के लिए अभिशप्त हैं। यहाँ यह बताना जरूरी होगा कि सहरिया आदिवासी मूलत: जगंल में निवास करने वाला समुदाय है। 

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इनका कहना है 

इस समुदाय के अधिकांश लोग अशिक्षित होने के कारण लगातार शोषण और उपेक्षा के शिकार हो रहे है। बेरोजगारी, शोषण, भूख, कुपोषण सहरिया समुदाय की पहचान बन गया है। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सहरिया आदिवासी सरकार की ओर आज भी उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं समाज के हाशिये पर खडे उपेक्षा झेल रहे सहरिया समुदाय को सरकार के सच्चे प्रयास की जरूरत है।

संजय बेचैन, सामाजिक कार्यकर्ता सहरिया क्रांति 

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