
शिवपुरी। 1993 से लगातार पिछोर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीत रहे कांग्रेस विधायक केपी सिंह इस बार चुनाव लड़ने के प्रति पशोपेश में है। उनका चुनाव के प्रति ढुलमुल रवैया क्यों है यह तो स्पष्ट नहीं है, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें अप्रत्याशित रूप से दिक्कत का सामना करना पड़ा था। जबकि इसके पहले हर बार वह आरामदायक बहुमत से चुनाव जीतते रहे हैं। कल कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बैठक में उन्होंने कार्यकर्ताओं से राय मांगी कि वह इस बार विधानसभा चुनाव लड़ें अथवा न लड़ें। हालांकि कार्यकर्ताओं ने उन्हें ढांढ़स बंधाते हुए कहा कि उन्हें चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं हैं और वह आराम से चुनाव जीतेंगे। जो भी कार्यकर्ता किसी कारणवश रूठ गए हैं उन्हें हम मना लेंगे।
पिछोर 1993 से अभी तक केपी सिंह का अभेद किला रहा है। 1993 में उन्होंने तत्कालीन राजस्व मंत्री लक्ष्मीनारायण गुप्ता को चुनाव मैदान में बुरी तरह से हराया और उस चुनाव के बाद श्री गुप्ता सक्रिय राजनीति से पूरी तरह दूर हो गए। 1993 के बाद 1998, 2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव में केपी सिंह ने अच्छे अच्छे महारथियों को धूल चटाई। इस विधानसभा क्षेत्र में लगभग 50 हजार लोधी मतदाता हैं और लोधी मतों को कबाड़ने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमाभारती ने अपने भाई स्वामी प्रसाद लोधी को भी 2003 के चुनाव पिछोर से केपी सिंह के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा। भाजपा ने उस चुनाव में केपी सिंह को हराने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन इसके बाद भी केपी सिंह लगभग 20 हजार मतों से चुनाव जीत गए। उनसे हारने वालों में पूर्व मंत्री भैयासाहब लोधी, जगराम यादव आदि धुंरधर भी थे। यह श्री सिंह के कौशल का ही कमाल था कि उन्होंने पिछोर में जातिगत गणित को धता-बताते हुए लगातार जीत हासिल की। कहा जाता है कि पिछोर कांग्रेस का नहीं, बल्कि केपी सिंह का व्यक्तिगत गढ़ है और यहां से उन्हें पराजित करना नामुमकिन है। यही कारण रहा कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस चुनाव क्षेत्र में शुरू से ही हारी हुई लड़ाई लड़ी। भाजपा ने यहां से बाहरी प्रत्याशी प्रीतम लोधी को चुनाव मैदान में उतारा। भाजपा का कोई भी धुुंरधर नेता और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रचार करने के लिए पिछोर नहीं आए। भाजपा ने शुरू से ही मान लिया था कि पिछोर में केपी सिंह के गढ़ को ढहाना उसके लिए असंभव है। ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में भाजपा प्रत्याशी प्रीतम लोधी ने केपी सिंह को एक-एक वोट के लिए संघर्ष हेतु विवश कर दिया। श्री सिंह चुनाव जीत अवश्य गए, लेकिन उनकी जीत बहुत छोटी थी और वह बड़ी मुश्किल से महज साढ़े छह हजार मतों से चुनाव जीते। जबकि इससे पहले वह चार चुनावों में औसत रूप से 18 से 20 हजार मतों से चुनाव जीतते रहे हैं। 2013 के चुनाव परिणाम ने यह संकेत दिया कि अगला चुनाव केपी सिंह के लिए आसान नहीं होगा। यही कारण रहा कि चुनाव जीतने के बाद केपी सिंह ने संकेत दिए कि शायद वह अगला चुनाव नहीं लड़ें। हाल ही में पिछोर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सभा में ऐतिहासिक भीड़ उमड़ी थी जिससे संकेत स्पष्ट थे कि 2018 में पिछोर में बाजी पलट भी सकती है और भाजपा यदि इस विधानसभा क्षेत्र में मेहनत करे तथा योग्य प्रत्याशी को चुनाव मैदान में उतारकर उसकी जीत के लिए कमर कसे तो इस बार पिछोर में भाजपा का कमल खिल सकता है। शायद इसे ही भांप कर केपी सिंह ने चुनाव लड़ने के प्रति उदासीनता दिखाई है। बीजासेन माता मंदिर के सभागार में आयोजित बैठक में कांग्रेस कार्यकर्ताओं से श्री सिंह ने खुलकर पूछा कि बताओ मेरी स्थिति कैसी है तथा आगे कैसी रहेगी। उन्होंने कहा कि मैं चुनाव लड़ूं या नहीं लडूं इसके विषय में आप अपनी राय दें। यदि चुनाव लड़ने के प्रति कार्यकर्ताओं की राय नहीं है तो मैं चुनाव नहीं लडूंगा। यह सभी बातें आप पर निर्भर करती हैं, क्योंकि अभी भी समय है कुछ गलती हो तो उसे सुधार सकते हैं।






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