
पंडित राजेश शर्मा के अनुसार होली की शुरुआत होलाष्टक से प्रारंभ होकर होली तक रहती है। इस कारण प्रकृति में खुशी और उत्सव का माहौल रहता है। इस वर्ष 13 से 20 मार्च के मध्य की अवधि होलाष्टक पर्व की रहेगी। होलाष्टक से होली के आने की दस्तक मिलती है, साथ ही इस दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं।
होलिका पूजन करने के लिए आठ दिन पहले होलिका दहन वाले स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर उसमें सूखे उपले, सूखी लकडी, सूखी घास व होली का डाड़ स्थापित कर दिया जाता है, जिस दिन यह काम किया जाता है, उस दिन को होलाष्टक प्रारंभ का दिन भी कहा जाता है। जिस गांव, क्षेत्र या मोहल्ले के चौराहे पर यह होली का डाड़ स्थापित किया जाता है, उसके बाद संबंधित क्षेत्र में होलिका दहन होने तक कोई शुभ काम संपन्न नहीं किया जाता है, जिस स्थान पर होली का डाड़ गाड़ा जाता है, वहां होलाष्टक से लेकर होलिका दहन के दिन तक प्रतिदिन कुछ लकड़ियां डाली जाती हैं। इस प्रकार होलिका दहन के दिन तक लकड़ियों का बड़ा ढेर बन जाता है। इस दिन से होली के रंग फिजाओं में बिखरने लगते हैं अर्थात होली की शुरुआत हो जाती है।






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