
सुनील रजक शिवपुरी। आईपीएल (इंडियन प्रीमियर लीग) की शुरुआत के साथ ही शिवपुरी में आईपीएल सटोरियों ने अपना नेटवर्क बिछाना शुरू कर दिया है मैच शुरू होते ही लोग टीवी के सामने बैठ जाते हैं। लेकिन यह धड़ाधड़ क्रिकेट खेलप्रेमियों के लिए जितना मनोरंजन है, उससे कहीं अधिक यह सटोरियों के लिए कमाई का जरिया बन गया है। शिवपुरी सहित ग्रामीण अंचलों में रोजाना लाखों के दांव लगने शुरू हो गए हैं। अब पुलिस इन बुकीज के चंगुल से मासूम बेरोजगार युवाओं के कैसे मुक्त कराती है,जबकि इनका नेटवर्क इससे कहीं ज्यादा बड़ा और तेज है। जिले में सटोरिए एक संगठित गिरोह के रूप में काम कर रहे हैं। सट्टा खिलाने वालों की एक अजीबो-गरीब भाषा है। कोर्डवर्ड हैं। महज एक फोन पर दांव लग जाता है और ऐसे ही रद्द भी हो जाता है। हार-जीत की राशि का बकायदा अगले दिन किसी जनरल स्टोर, मोबाइल शॉप या पान की दुकान से भुगतान कर दिया जाता है। “आज फेवरिट कौन है”, ‘सेशन एक पैसे का है”, ‘डिब्बे की आवाज कितनी है”, ‘लंबी पारी हो तो बात कर” यह कोई आम बोलचाल नहीं वे वाक्य हैं जो सटोरिया इस्तेमाल करते हैं। इन वाक्यों से रोजाना लाखों रुपए का खेल होता है। पूरे खेल में चार लेयर होती हैं और इन्हीं के माध्यम से काले कारोबार को अंजाम दिया जाता है।
आप ऐसे समझें पूरा नेटवर्क – हर शहर में एक प्रमुख सटोरिया होता है, जो नागपुर या मुंबई में बैठे बुकी के संपर्क में रहता है। मुखिया बनने के लिए वह बुकी को एडवांस रकम जमा करता है। – फिर शहर का यही मुखिया अपने अलग-अलग एजेंट बनाता है। वह भी अपने इन एजेंटों से एक निश्चित एडवांस रकम वसूलता है, ताकि वे रुपए खाकर भाग न जाए। – ये एजेंट अपने स्तर पर ‘लड़के” तैयार करते हैं, जिन्हें एक खास भाषा में पंटर कहा जाता है। ये पंटर ही आग लोगों से फोन पर बातचीत करके दांव फिक्स करते हैं। कुछ ऐसी होती है भाषा खेलने वालों को भी एजेंट को एडवांस देकर अकाउंट खुलवाना पड़ता है, जिसकी एक लिमिट होती है। सट्टे के भाव को डिब्बे की आवाज बुलाया जाता है। सट्टेबाज 20 ओवर को लंबी पारी, दस ओवर को सेशन और छह ओवर तक सट्टा लगाने को छोटी पारी खेलना कहते हैं।
दिल्ली-मुंबई में बैठे बुकी को इनकी भाषा में डिब्बा कहा जाता है। सावधानी इतनी होती है कि एक बार कोई नंबर उपयोग हो गया तो उसे दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता। पंटर रिसीव करते हैं फोनमैच शुरू होने के दस मिनट पहले चारों स्तर के सटोरिए अलर्ट हो जाते हैं। फिर सट्टा खेलने वाले फोन लगाना शुरू करते हैं, जिन्हें पंटर रिसीव करते हैं। मैच की पहली गेंद से लेकर जीत तक भावों में उतार-चढ़ाव चलता है। इनकी विशेष भाषा में एक लाख को एक पैसा, 50 हजार को अठन्नी, 25 हजार को चवन्नी कहा जाता है। यदि किसी ने दांव लगा दिया और वह कम करना चाहता है तो फोन पर पंटर को ‘मैंने चवन्नी खा लीÓ कहना होता है। टीवी से भी तेज हैं सटोरिएआमतौर पर टीवी पर मैच देखने वालों को यह लगता है कि वहां मैदान में शॉट खिला कि टीवी पर आ गया, लेकिन ऐसा नहीं होता है। प्रसारण संबंधी तकनीकी कारणों से ग्राउंड और टीवी के शॉट में एक गेंद का अंतर आ जाता है और यही एक गेंद सटोरियों के लिए मुनाफे का जरिया बनती है। क्योंकि बुकी (डिब्बा) का एक आदमी सीधे ग्राउंड से हर गेंद की जानकारी तत्काल अपडेट करता है और यहां भाव बदल जाते हैं। दूसरा अपडेट सटोरिए इंटरनेट से भी लेते हैं। मार्केट में कुछ ऐसे एप हैं जो टीवी से पहले हर गेंद का अपडेट दे देते हैं। इन्हीं के माध्यम से भाव की दिशा तय हो जाती है। भाव मुंबई-नागपुर से होते हैं तय मुंबई-नागपुर में बैठे बुकी अपने अनुभव और टीमों के पिछले प्रदर्शन के आधार पर रेट तय करते हैं। पहले छह ओवर के सेशन में दो-तीन गेंदों के बाद ही भाव खुल जाते हैं। जबकि दूसरे तरीके में फेवरेट टीम की खरीदी-बेची जाती है।
1. सेशन का खेल यदि किसी टीम ने अपने पिछले मैच में छह ओवर के दौरान 40 रन बनाए थे तो सटोरिए 43 या 45 रुपए का भाव तय करेंगे। बढ़ाकर इसलिए करते हैं ताकि उनके जीतने की संभावनाएं ज्यादा हो जाएं। यानि किसी ने एक हजार रुपए लगाए हैं और यदि टीम ने सेशन में 43 या 45 रन बना लिए तो उसे दो हजार रुपए मिल जाएंगे लेकिन यदि ऐसा नहीं होता है तो पूरी राशि सटोरिए के खाते में चली जाएगी। खेलने वालों को पहले सेशन में कितने भी रुपए लगाने की छूट दी जाती है। सेशन के दौरान यदि खिलाड़ी तेज खेलने लगें और ऐसा लग रहा है कि छह ओवर में 55 रन या उससे अधिक बन जाएंगे तो भाव बढ़ जाते हैं। मतलब एक हजार लगाने वाले को सटोरिए की ओर से ढाई हजार रुपए का भुगतान किया जाएगा।
2. फेवरेट टीम इसी तरह दूसरे तरीके में सटोरिए टीम बेचते हैं। यानि की मैच शुरू होने से पहले ही सटोरियों की ओर से फेवरेट टीम जारी हो जाती है। जो टीम कमजोर होती है उसके भाव तेज होते हैं। उदाहरण के तौर पर पंजाब और केकेआर का मैच चल रहा है। इसमें पंजाब का प्रदर्शन पिछले मैचों में कमजोर रहा तो उसके भाव तेज रहेंगे। मतलब यदि किसी ने केकेआर पर एक हजार रुपए लगाएं हैं और भाव 70/20 का चल रहा है तो उसे महज दो सौ रुपए बढ़ोतरी के साथ कुल 1200 रुपए का भुगतान किया जाएगा, जबकि यदि किसी ने पंजाब पर एक हजार रुपए लगाएं हैं तो सात सौ रुपए के साथ कुल 1700 रुपए दिए जाएंगे। अंत तक भावों में चढ़ाव-उतार का क्रम चलता रहता है। अगले दिन होता है राशि का भुगतानमैच के अगले दिन सटोरियों द्वारा तयशुदा किराना दुकानों, जनरल स्टोर्स, मोबाइल शॉप या पानी की दुकान से भुगतान कर दिया जाता है। वहां जाकर अलग-अलग कोडवर्ड बताने पड़ते हैं। जैसे किराना दुकान पर किसमिस देदो, जनरल स्टोरी पर ब्रश आ गया, मोबाइल शॉप पर बैट्री बैंक चाहिए आदि।आज के दौर में आईपीएल मनोरंजन का साधन कम सटोरियों के लिए करोड़ो के वारे न्यारे करने का साधन मात्र बन गया है इसी के लालच में बेरोजगार युवा फसकर अपना जीवन बर्बाद कर रहे।






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