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DMZ में ट्रंप और किम की मुलाकात के मायने, उत्तर कोरिया पर इसलिए सही है ट्रंप की नीति ! International News

DMZ में ट्रंप और किम की मुलाकात के मायने, उत्तर कोरिया पर इसलिए सही है ट्रंप की नीति
सियोल। उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच स्थित डिमिलिट्राइज जोन में उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन से महज दो मिनट की मुलाकात के लिए राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप पहुंचे थे। अब इस बैठक के मायने निकाले जा रहे हैं। जानकार मान रहे हैं कि उत्तर कोरिया के प्रति ट्रंप का कदम एकदम सही है। उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच DMZ करीब चार किमी की दूरी तक फैला यह जोन दुनिया का सबसे संवेदनशील इलाका है। लिहाजा, यहां पर दोनों तरफ काफी संख्‍या में जवान तैनात रहते हैं। यहां ट्रंप की किम से मुलाकात अपने आप में कई संकेत दे रही है।
दोनों नेताओं दो अलग-अलग दिशाओं से आए और हाथ मिलाया। इसके बाद किम और ट्रंप ने कुछ दूरी तक साथ चलते हुए कुछ बात भी की। यह दोनों नेताओं के बीच तीसरी मुलाकात थी। मगर, यह बात हाथ मिलाने से कुछ ज्यादा है। ट्रंप ने कई बार किम की पीठ थपथपाते हुए कहा- “बड़े पल, बड़े क्षण”। ट्रंप ने यह भी कहा कि वह किम को व्हाइट हाउस में उनसे मिलने के लिए आमंत्रित करेंगे। इस पर किम ने मुस्कुराते हुए अपने द्विभाषिये के जरिये ट्रंप से कहा- एक बार फिर से आपको देखना अच्छा लगा। मुझे इस जगह पर आपसे मिलने की उम्मीद नहीं थी। दोनों नेताओं ने पुराने दोस्तों की तरह एक दूसरे से भेंट की।

फिर से तेज हुई राजनायिक गतिविधियां
फरवरी में किम के साथ बिना किसी समझौते के दूसरा शिखर सम्मेलन विफल हो गया था। इसके बाद उत्तर कोरिया ने हाल ही के हफ्तों में अमेरिकी प्रतिबंधों और रुकी हुई वार्ता पर अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और दक्षिण कोरियाई नेतृत्व के खिलाफ एक व्यापक अभियान चलाया था। मगर, किम और ट्रंप की इस मुलाकात के बाद राजनायिक गतिविधियां फिर से शुरू हो गई हैं।

रुकी हुई वार्ता को फिर से शुरू करने की पहल
माना जा रहा कि इससे दोनों देशों के बीच बढ़ रहा तनाव कम होगा। चंद मिनटों की मुलाकात के लिए और ट्रंप की तरफ से भेजे गए आमंत्रण के बाद किम जोंग उन DMZ पर इस सीमा पर आए थे। ट्रंप ने रुकी हुई परमाणु वार्ता को फिर से शुरू करने का फैसला किया है। किसी को भी इस तरह की मुलाकात की उम्मीद नहीं थी।

कूटनीति से मामले का हल निकालने की पहल
इस मुलाकात के जो नतीजे निकाले जा रहे हैं, वे बता रहे हैं कि ट्रंप कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु निःशस्त्री करण करने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका कूटनीति को मान रहे हैं। वह समझ रहे हैं कि उत्तर कोरिया के साथ युद्ध भयावह होगा क्योंकि वह भी एक परमाणु शक्ति है, जो लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों के जरिये अमेरिका को अपनी जद में ले सकता है।

उत्तर कोरिया ने DMZ पर हजारों रेडी-टू-फायर आर्टिलरी तैनात की हैं, जो दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल की एक करोड़ की आबादी को निशाना बना सकती हैं। पूर्वी एशिया में तैनात अमेरिकी सैनिक भी निशाना बनाए जा सकते हैं, जो इस इलाके की सीमा से लगभग 50 किमी दूर तैनात हैं। ट्रंप के इस कदम से लगता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने सैन्य विकल्प को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
चुनौतियां भी कम नहीं हैं

किम ने भी अमेरिका के साथ जुड़ने और उत्तर की अर्थव्यवस्था को खोलने में रुचि दिखाई है, जिसे अमेरिकी प्रतिबंधों से राहत की जरूरत है। इसके अलावा, उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम मुख्य रूप से निवारण में निहित है न कि विस्तारवाद में। इसलिए, कम से कम सिद्धांत रूप में उत्तर की सुरक्षा चिंताओं को हल करके और अमेरिकी प्रतिबंध हटा दिए जाने पर सौदा हो सकता है। किम सिद्धांत रूप में परमाणु निःशस्त्रीकरण के लिए सहमत हुए हैं। मगर, यह कब और कैसे किया जाना चाहिए यह विवाद का प्रमुख मुद्दा है।
दोनों देशों में है ऐतिहासिक अविश्वास
जब दोनों देशों की बातचीत करने वाली टीमें इस मुद्दे को हल करने के लिए बैठती हैं, तो उन्हें पूर्वाग्रहों का सामना भी करना होगा। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक अविश्वास है। विशेष रूप से उत्तर कोरिया मानता है कि उन्हें कई बार कोरियाई युद्ध की शुरुआत में अमेरिका ने धोखा दिया था। 1990 के दशक में, उत्तर कोरिया और अमेरिका (क्लिंटन प्रशासन) ने उत्तर की परमाणु गतिविधियों को मुक्त करने के लिए ‘सहमत रूपरेखा’ पर हस्ताक्षर किए थे। मगर, जब जॉर्ज डब्ल्यू बुश प्रशासन ने शत्रुतापूर्ण व्यवहार किया, तो प्योंगयांग इस सौदे से बाहर निकल गया था। इस बार भी उत्तर कोरिया के पास ऐसी क्या गारंटी है कि राष्ट्रपति ट्रंप के साथ एक समझौते हो जाने पर कोई अन्य प्रशासन इसके खिलाफ नहीं होगा?
ट्रंप की विदेश नीति से उत्तर कोरियाई लोग क्या आश्वस्त होंगे
ट्रंप की अन्य विदेशी नीति निर्णय भी शायद ही उत्तर कोरियाई लोगों को आश्वस्त करेंगे। उन्होंने अमेरिका को ईरान के परमाणु समझौते से बाहर निकाल लिया है, जिसे उनके पूर्ववर्ती बराक ओबामा ने तेहरान और अन्य विश्व शक्तियों के साथ साइन किया था। प्रतिबंधों के उठाने के बदले में समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने पर सहमति व्यक्त की थी। मगर, अब ट्रंप प्रशासन अब ईरान के साथ युद्ध की स्थिति में है, जिसे अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध निचोड़ रहे हैं। एक अन्य उदाहरण लीबिया का है, जिसके नेता मुअम्मर गद्दाफी ने पश्चिम के साथ तालमेल के बदले में अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ दिया था। नाटो ने अरब विरोध के मद्देनजर साल 2011 में लीबिया पर हमला किया और गद्दाफी को विद्रोहियों ने मार दिया। उत्तर कोरियाई शासन जानता है कि उसके परमाणु हथियार संभावित सत्ता परिवर्तन युद्ध के खिलाफ उसका सबसे बड़ा सुरक्षाकवच हैं।
दुनिया देखेगी कि आगे क्या होगा
हालांकि, इस मुलाकात के भविष्य में क्या नतीजे निकलेंगे यह तो वक्त ही बेहतर बताएगा। मगर, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और विश्लेषकों ने निष्कर्ष निकाला है कि उत्तर कोरिया के अपने परमाणु शस्त्रागार को छोड़ने की संभावना नहीं है। किम ने मई में मिसाइलों और प्रक्षेपास्त्रों को लॉन्च करने के साथ ही अधिक परमाणु हथियार परीक्षणों की धमकी देकर एक अंतर्राष्ट्रीय संकट खड़ा कर दिया है।
सियोल में एवा वुमन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के एसोसिएट प्रोफेसर लेइफ एरिक इस्ले ने कहा कि कल भी उत्तर कोरिया के पास परमाणु हथियार होंगे और अमेरिका प्रतिबंधों को बनाए रखेगा। ट्रंप ने किम की बहुत प्रशंसा के बीच सावधानी शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा था कि इस पल के कुछ ठोस होगा, अगर इस मुलाकात से कुछ भी अच्छा होता है, तो यह और भी ऐतिहासिक होगा।
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