- विशेषज्ञों के मुताबिक, मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में कश्मीर के 18 दौरे कर जाहिर कर दिया कि राज्य उनके टॉप एजेंडे में है
- 2004 से 2014 तक कश्मीर में हर साल 900 से ज्यादा आतंकी घटनाएं होती थीं, पिछले 5 साल में सालाना 300 से ज्यादा घटनाएं हुईं
- हुर्रियत नेताओं पर सख्ती के बाद घाटी में पत्थरबाजी की घटनाएं कम हो गईं
नई दिल्ली. पंद्रह दिन पहले जब जम्मू-कश्मीर में उथलपुथल बढ़ी तो कयास लगाए जाने लगे कि मोदी सरकार राज्य के लोगों को विशेषाधिकार देने वाले अनुच्छेद 35-ए को हटा सकती है। लेकिन केंद्र ने उससे भी आगे जाकर कदम उठाया और कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को ही निष्प्रभावी कर दिया। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांटकर दो केंद्र शासित प्रदेश बना दिए। भाजपा सरकार ने दूसरी बार सत्ता में आने के बाद 17वीं लोकसभा के पहले ही सत्र में कश्मीर पर फैसला कर लिया।
1) पहले कार्यकाल में मोदी ने कश्मीर के 18 दौरे किए
मई 2014 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के दिन ही मोदी ने गृह मंत्री बने राजनाथ सिंह से 9 मिनट राष्ट्रपति भवन में कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा की थी। इसके बाद जुलाई 2014 में मोदी ने कश्मीर का दौरा किया। 2014 में ही उन्होंने राज्य के 9 दौरे किए। पहले कार्यकाल में मोदी ने 18 बार जम्मू-कश्मीर का दौरा कर साफ कर दिया कि कश्मीर उनके टॉप एजेंडे में शामिल है। उनके दौरों का मकसद कश्मीर की जनता से सीधे जुड़ना था।
मई 2014 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के दिन ही मोदी ने गृह मंत्री बने राजनाथ सिंह से 9 मिनट राष्ट्रपति भवन में कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा की थी। इसके बाद जुलाई 2014 में मोदी ने कश्मीर का दौरा किया। 2014 में ही उन्होंने राज्य के 9 दौरे किए। पहले कार्यकाल में मोदी ने 18 बार जम्मू-कश्मीर का दौरा कर साफ कर दिया कि कश्मीर उनके टॉप एजेंडे में शामिल है। उनके दौरों का मकसद कश्मीर की जनता से सीधे जुड़ना था।
2) श्यामा प्रसाद मुखर्जी की नीति अपनाई
- जम्मू-कश्मीर विधान परिषद के पूर्व सदस्य और भाजपा नेता विबोध गुप्ता बताते हैं कि मोदी सरकार की कश्मीर नीति वही रही, जो श्यामा प्रसाद मुखर्जी की थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी कहते थे कि एक देश में दो विधान, दो निशान नहीं चलेंगे। यही भाजपा के एजेंडे में रहा। अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी होने से कश्मीर अब सही मायने में आजाद हो गया है। अब मोदी सरकार का अगला लक्ष्य नया जम्मू-कश्मीर बनाना है। ऐसा कश्मीर जहां विकास हो, पर्यटन हो, प्राइवेट सेक्टर हो, अच्छे अस्पताल हों। अभी तक अनुच्छेद 370 और 35ए के कारण यह सब नहीं था, लेकिन अब यह सब होगा।
- संविधान विशेषज्ञ राकेश द्विवेदी कहते हैं कि अनुच्छेद 370 के हटने का लंबे समय से इंतजार था। यह ऐतिहासिक कदम है। अब इस अनुच्छेद की कोई जरूरत नहीं रह गई थी। इतिहास बताता है कि कश्मीर ने कभी इस्लाम के लिए दरवाजे बंद नहीं किए। बौद्ध धर्म और इस्लाम भी कश्मीर के रास्ते आया। तो अब नौकरियों और विकास की खातिर कश्मीर के दरवाजे बंद नहीं रखने चाहिए।
3) सेना को खुली छूट मिली
मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में ही सेना को खुली छूट दे दी थी। घाटी में आतंकवाद कम करने के लिए ऑपरेशन ऑलआउट चलाया, जिसके तहत आतंकियों के खिलाफ खुलकर कार्रवाई की गई। पिछले पांच साल में घाटी में 838 आतंकी सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे गए। इनमें कई मोस्ट वॉन्टेड और आतंकी गुटों के सरगना थे। गृह मंत्रालय के मुताबिक, 2016 से 2018 के बीच दो साल में सेना ने घेराबंदी और तलाशी अभियान में 97 आतंकियों को गिरफ्तार किया। इसके साथ ही इन दो साल में सेना ने 29 ऐसे ठिकानों का भी पता लगाया, जहां आतंकी छिपते थे।
मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में ही सेना को खुली छूट दे दी थी। घाटी में आतंकवाद कम करने के लिए ऑपरेशन ऑलआउट चलाया, जिसके तहत आतंकियों के खिलाफ खुलकर कार्रवाई की गई। पिछले पांच साल में घाटी में 838 आतंकी सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे गए। इनमें कई मोस्ट वॉन्टेड और आतंकी गुटों के सरगना थे। गृह मंत्रालय के मुताबिक, 2016 से 2018 के बीच दो साल में सेना ने घेराबंदी और तलाशी अभियान में 97 आतंकियों को गिरफ्तार किया। इसके साथ ही इन दो साल में सेना ने 29 ऐसे ठिकानों का भी पता लगाया, जहां आतंकी छिपते थे।
4) आतंकी घटनाओं में 5 साल में 66% की कमी आई
1990 में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और चरमपंथ पनपने के बाद 2018 तक 70,673 आतंकी घटनाएं हो चुकी हैं। इन घटनाओं में 22,400 आतंकी मारे गए हैं। इसी दौरान 13 हजार से ज्यादा आम नागरिक मारे गए, जबकि 5 हजार से ज्यादा जवान शहीद हो गए। 2004 से 2014 तक 9,739 आतंकी घटनाएं हुईं। यानी हर साल औसतन 900 से ज्यादा आतंकी घटनाएं हुईं। इनमें चार हजार आतंकी मारे गए, लेकिन दो हजार आम नागरिकों की मौत हुई और एक हजार से ज्यादा जवान शहीद हो गए। वहीं, 2014 से 2019 के बीच 1708 आतंकी घटनाएं हुईं। इनमें 838 आतंकी मारे गए, लेकिन 138 आम नागरिकों की मौत हुई और 339 जवान शहीद हो गए। पिछले पांच साल में हर साल औसतन 300 से ज्यादा घटनाएं हुईं जो पिछले 10 वर्ष के सालाना औसत आंकड़े की तुलना में एक तिहाई है
1990 में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और चरमपंथ पनपने के बाद 2018 तक 70,673 आतंकी घटनाएं हो चुकी हैं। इन घटनाओं में 22,400 आतंकी मारे गए हैं। इसी दौरान 13 हजार से ज्यादा आम नागरिक मारे गए, जबकि 5 हजार से ज्यादा जवान शहीद हो गए। 2004 से 2014 तक 9,739 आतंकी घटनाएं हुईं। यानी हर साल औसतन 900 से ज्यादा आतंकी घटनाएं हुईं। इनमें चार हजार आतंकी मारे गए, लेकिन दो हजार आम नागरिकों की मौत हुई और एक हजार से ज्यादा जवान शहीद हो गए। वहीं, 2014 से 2019 के बीच 1708 आतंकी घटनाएं हुईं। इनमें 838 आतंकी मारे गए, लेकिन 138 आम नागरिकों की मौत हुई और 339 जवान शहीद हो गए। पिछले पांच साल में हर साल औसतन 300 से ज्यादा घटनाएं हुईं जो पिछले 10 वर्ष के सालाना औसत आंकड़े की तुलना में एक तिहाई है





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