- बीएचयू के प्रोफेसर डॉक्टर राजीव श्रीवास्तव ने यह भवन बनवाया है, इसमें 28 मुस्लिम और 12 हिंदू बच्चे रहते हैं
- वे कहते हैं- इस काम से मुझे सुकून मिलता है, मैं इसके लिए अपने परिवार से दूर रह रहा हूं
वाराणसी (उत्तरप्रदेश). बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉक्टर राजीव श्रीवास्तव ने बेसहारा और गरीब बच्चों के लिए 53 लाख रुपए का कर्ज लेकर सुभाष भवन बनवाया है। इसमें एक छत के नीचे 40 बच्चे रहते हैं, जिनमें 28 मुस्लिम व 12 हिंदू हैं। सब मिलजुल कर रहते हैं। राजीव कहते हैं कि इस काम से मुझे सुकून मिलता है। मुझे परिवार ने समाज सेवा और घर में से किसी एक चुनने के लिए कहा था। तब से मैंने घर छोड़ दिया। अब तक 700 बच्चों को शिक्षा दे चुका हूं।
सुभाष भवन को 2720 वर्ग फीट में बनाया गया है। यहां के सभी बच्चे सरकारी क्वींस कॉलेज और जीजीआईसी में पढ़ते हैं। 10 बच्चे हायर एजुकेशन में है, जिनमें अर्चना और नजमा बीएचयू से पीएचडी कर रही हैं। नाजनीन बीएचयू से एमए कर चुकी हैं।
भवन में अनुशासन, हर काम का वक्त तय है
- प्रोफेसर राजीव बताते हैं कि इस भवन का अपना अनुशासन है। यहां सुबह पांच बजे ड्रम बजता है। सुबह रोजाना भारत माता की प्रार्थना होती है। फिर बच्चे स्वच्छता अभियान में लग जाते हैं। उद्देश्य होम ऑफ सेक्रिफायस यानि त्याग सभी को करना है। रविवार को तिरंगे के साथ जय हिंद भारत सलामी सभा होती हैं।
- किचन का नाम अन्नपूर्णा है, जिसकी इंचार्ज नाजनीन अंसारी हैं। जबकि पूजा घर, भगवान की आरती और भोग का इंतजाम करना ईली की जिम्मेदारी है।
- सुभाष भवन में अनुशासन के लिए कमेटियां बनी हैं। स्वच्छता, बाथरूम बिहेवियर, जल संरक्षण, भोजन, खर्च, विधुत संरक्षण कमेटी है। अनुशासन समिति, अन्नपूर्णा समिति, कूड़ा निस्तारण समिति, सुरक्षा समिति सभी की देखरेख बच्चे ही करते हैं।
पास बनते हैं छात्रों के लिए
- सुभाष भवन में बच्चों के लिए तीन तरह के पास बनाए जाते हैं। अस्थाई, परमानेंट, अल्पकालिक। अल्पकालिक पास उन छात्रों को दिए जाते हैं, जो सुभाष भवन, नेता सुभाष चंद्र बोस, विशाल भारत, अनाज बैंक, चिल्ड्रेन बैंक पर रिसर्च करता है।
- एक दिन के लिए रहने वालों के लिए अस्थाई पास दिए जाते हैं। परमानेंट पास सुभाष भवन से जुड़ने वालों के लिए दिए जाते हैं।
मुगलसराय स्टेशन पर पढ़ाना शुरू किया था
राजीव बताते हैं कि उन्होंने मुगलसराय में 1988 में कुछ बच्चो को प्लेटफॉर्म नंबर पर पढ़ाना शुरू किया था। 1992 में पिता डॉक्टर राधेश्याम श्रीवास्तव ने शर्त रख दी कि या तो परिवार चुन लो या बच्चों के साथ रह लो। उसी दिन केवल मार्कशीट लेकर बनारस रेलवे स्टेशन आ गया और फिर पलटकर पीछे नहीं देखा। तीन महीने लगातार बनारस के स्टेशन को आशियाना बनाना पड़ा था। काशी विद्यापीठ से ही पीएचडी की। 1996 में काशी विद्यापीठ में संविदा पर पढ़ाने का मौका मिला। 2007 में बीएचयू में जॉब मिल गई। अब 700 से ऊपर बच्चों को अपने पैसे से तालीम दी है। 2016 में सुभाष भवन के लिए जमीनी खरीदी थी, जिसका 17 जून 2018 को शिलान्यास किया गया। इससे पहले किराए के घर में रहते थे। इसी साल 18 फरवरी को भवन में शिफ्ट हुए।





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