सुनील रजक शिवपुरी (7000757275)। शिवपुरी जिले के सिकन्दरा परिवहन बैरियर पर तैनात लठैतों के हावभाव और फिल्मी स्टाईल में चल रही अवैध वसूली के अंदाज को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे परिवहन विभाग ने अपने इस बैरियर को अघोषित रूप से ठेके पर उठा लिया है। कटरों के नाम से इस बैरियर पर तैनात इन लठैतों के आगे परिवहन विभाग के वर्दीधारी कर्मचारियों की भी कोई हैसियत नजर नहीं आती। आरटीओ से सीधे संपर्क रखने वाले कटर बैरियर पर तैनात होकर परिवहन कर्मचारियों को आंखें दिखाने से भी नहीं चूकते। संभवत: यही कारण है कि इस बैरियर की राजस्व आय के ग्राफ में निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है।
शासन को लगी करोड़ों की चपत
सिकन्दरा परिवहन बैरियर से जुड़े बताते है कि यह बैरियर कभी समूचे मप्र में परिवहन विभाग की आय का सबसे बड़ा स्त्रोत माना जाताथा लेकिन यहां कटरों की तैनाती के बाद इस बैरियर के राजस्व आय का ग्राफ इतनी तेजी से गिरा है कि अब इस बैरियर का नाम मप्र के सबसे कम राजस्व आये वाले बैरियरों में शुमार हो गया है। परिवहन आयुक्त ने भी स्थानीय पत्रकारों से चर्चा के दौरान स्वीकार किया था कि सिकन्दरा बैरियर की राजस्व में गिरावट आई है। इस बैरियर पर तैनात अधिकारियों की कार्यप्रणाली भी संदिग्ध प्रतीत होती है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सिकन्दरा बैरियर पर कटरों की अवैध मौजूदगी और कूपन फाड़कर की जा रही अवैध वसूली की शिकायत उन्हें मिल रही है। उन्होंने शिकायतों की जांच कराने और दोषी अधिकारियों के विरूद्ध कार्यवाही की बात भी कही। लेकिन बैरियर पर अवैध वसूली कर परिवहन विभाग के राजस्व को पलीता लगाने में जुटे अधिकारियों के खिलाफ अभी तक कोई भी कार्यवाही प्रकाश में नहीं आई है। सूत्र बताते है कि जिला स्तर पर भी सिकन्दरा बैरियर की गिरती राजस्व आय को आधार बनाकर विभागीय अधिकारी कारणों का खुलासा कर चुके है। इस बैरियर की घटती राजस्व आय के लिए कटरों द्वारा की जा रही अवैध वसूली और कूपन प्रणाली को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार कूपन फाड़कर की जा रही अवैध वसूली का पूरा लेखा जोखा कटरों के पास रहता है और इस राशि में से बटोने की तर्ज पर नीचे से ऊपर तक बंदरबांट किया जाता है।
ऐसे होती है वसूली
यहां परिवहन चैक पोस्ट पर सबसे पहलेे तो ऑवरलोड गाडियों को रोका जाता है। उसके बाद इन गाडियों की तौल की जाती है। जिसमें क्षमता से अधिक माल होने पर इनपर ट्रेक्स बसूलने का प्राबधान है। परंतु जैसे ही ऑवरलोड गाडी सामने आती है। यहां प्रायवेट लोग सक्रिय हो जाते है और इस गाडी को निकालने के एवज में 2000 से 3000 हजार रूपए तक रेट बताते है। हालांकि विधिवत तौर से अगर इन गाडियों पर कार्यवाही की जाए तो यह पांच हजार तक पहुंच जाती है। जिसके चलते उक्त वाहन चालक बिना रसीद के ही 2 से 3 हजार के बीच मामला सुलझा कर चलते बनते है। इस राशि को ठेकेदार अपनी जैब में रख लेता है।






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