शिवपुरी। गत दिवस शहर की साहित्यिक संस्था बज्मे उर्दू की मासिक काव्य गोष्ठी शहर के व्यस्ततम मार्ग पर स्थित गांधी सेवाश्रम में आयोजित की गई। डॉक्टर मुकेश अनुरागी की अध्यक्षता में संपन्न हुई इस काव्य गोष्ठी का संचालन सत्तार शिवपुरी ने किया, उन्होने कहा- हिन्दू मुस्लिम गले मिले जो इक दूजे को भीच, इक मंदर ऐसा बनवादें शहर के बीचों बीच।
गोष्ठी के आरंभ में भगवान सिंह यादव ने जमाने के बदलते स्वरूप का जिक्र करते हुए कहा- न बेटा बाप की सुनता न मां की कद्र करता है, दुखी मां बाप बेटे से जमाने की हवा क्या है।
वहीं डॉक्टर मुकेश अनुरागी लिखते हैं- मेरी खुद्दारी ने मुझको घर से बेघर कर दिया, पर खुदा ने मेरे सर पर नीला अम्बर कर दिया।
साजिद अमन लिखते है- वक्त बदला तो बदला जहां देखते – देखते, छू लिया इंसान ने आसमां देखते देखते।
राधेश्याम परदेसी ने हताश होकर कहा, गुनाहों की दास्ताने सुनते सुनते थक गया हूं मैं, के नफरत के बढ़ते कदम देख रुक गया हूं मैं।
वही सत्तार शिवपुरी ने कहा, हमने क्या घर बार तुम्हारा मांगा था, क्या कोई संसार तुम्हारा मांगा था, सूरज चांद सितारे हमने कब मांगे थे, हमने केवल प्यार तुम्हारा मांगा था।
तरही मिसरे पर शकील नश्तर लिखते हैं, उनकी सारी तदबीरें कारगर नहीं होती, मां का दिल दुखाते हैं और ख्वार होते हैं।
इशरत ग्वालियरी लिखते हैं, जख्मों को कुरेदें हैं आते जाते निश्तर से, तुम बताओ क्या ऐसे दोस्त यार होते हैं।
रामकृष्ण मौर्य ने कहा, हमने तुमने देखे थे ख्वाब साथ रहने के, दुख है ख्वाब बे सारे तार-तार होते हैं।
डॉक्टर संजय शाक्य को देखें, घर बनाने वालों ने एक घर बनाया था, जिद से आज बच्चों की हिस्से चार होते हैं। डॉ मुकेश अनुरागी ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा मुझे खुशी है आप समाज को अच्छा साहित्य परोस रहे हैं उन्होंने यह भी कहा कि 1 जनवरी को होने वाली काव्य गोष्ठी में नए वर्ष पर और अच्छा लिखकर लाएं अंत में सत्तार शिवपुरी ने सभी साहित्यकारों का आभार प्रकट करते हुए शुक्रिया अदा किया






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