शिवपुरी। शहर की साहित्यिक संस्था बज्मे उर्दू की मासिक काव्य गोष्ठी व्यस्ततम मार्ग ए बी रोड पर स्थित गांधी सेवाश्रम में मोहम्मद याकूब साबिर की अध्यक्षता एवं राकेश सिंह राकेश के आतिथ्य में आयोजित की गई। इस गोष्ठी का संचालन सत्तार शिवपुरी ने किया। गोष्ठी में पढ़े गए प्रमुख अंश देखें।
डॉक्टर संजय शाक्य लिखते हैं-
अब दुआओं से काम चलता है,
अब दवा के असर गए शायद
हास्य व्यंग के कवि राजकुमार चौहान का एक दोहा देखिए-
कुंभकार गुरु तो रहे शिष्य हो गए डॉन,
धमकी गुरु को दे रहे डांट लगइया कौन
राकेश सिंह राकेश ने अपना दीपावली पर लिखा गया गीत पड़ा-
जुगर- जुगर बाती सुलगत है,
दिया का पिटवा खाली है,
शायद आज दीवाली है
वही सत्तार शिवपुरी ने कहा-
मैंने कदमों पर रख दिया खंजर,
दुश्मनी दोस्ती से हारी है
इन्हीं का एक और शेर देखें-
मैं नदी हूं तो कुछ भी कह लीजै,
वो समंदर है फिर भी खारी है
सलीम बादल लिखते हैं-
कुछ पता ना चला कैसे क्या हो गया,
कब मेरा दिल तेरा आशिना हो गया
राधेश्याम सोनी ‘‘परदेसी‘‘ लिखते हैं-
उजड़ गया मेरा गुलशन बहारों के बिना,
जिंदगी कैसे बसर होगी सहारों के बिना
वही रामकृष्ण मौर्य ने कहा-
तुमको देखने को यह आंखें तरसती मेरी,
तुम जलवा दिखा जाओ कितना हसीं है मौसम
इशरत ग्वालियरी को देखें-
आज औलाद समझती है मुसीबत जिनको,
फर्ज कहकर उठाते थे जो संतान का भोज
मोहम्मद याकूब साबिर ने कहा-
भूल जाना मेरी फितरत में नहीं है शामिल,
फिर भी उस दिन की कोई बात मुझे याद नहीं
अंत में अध्यक्षीय उद्बोधन के बाद सत्तार शिवपुरी ने सभी साहित्यकारों का आभार प्रदर्शित करते हुए शुक्रिया अदा किया।






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