शिवपुरी । शिवपुरी। अगस्त महीने में कूनो पालपुर नेशनल पार्क में चीतों के आने की बात कही जा रही है जबकि प्रोजेक्ट के सीसीएफ सीएस निनामा ने शासन से कोई भी तारीख के संबंध में नहीं बताया है। 70 साल बाद देश में आ रहे चीतों को देखने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। क्योंकि चीतों को यहां पर पुनः स्थापित किया जा रहा है और उनके स्थापित होने के बाद ही पर्यटकों के लिए इन्हें उपलब्ध कराया जाएगा। चीतों के आने की तेज आहट के बीच भी स्थानीय या प्रदेश स्तर के अधिकारियों को इसकी अधिक जानकारी नहीं है। अभी केंद्रीय स्तर पर ही इस प्रोजेक्ट पर आगे का काम किया जा रहा है। सीसीएफ सीएस निनामा ने बताया कि पहले चरण में 10 से अधिक चीते भी आ सकते हैं। इन्हें रखने के लिए 500 हेक्टेयर का बाड़ा बनाया गया है। बाड़े के चारों ओर सौलर इलेक्ट्रिक फेसिंग लगाई गई है जिससे चीता को सुरक्षित रखा जा सके।
चीतों की 30 दिन की क्वारंटाइन अवधि पूरी होने के बाद उन्हें बाड़े में छोड़ दिया जाएगा। इसके बाद वाइल्ड लाइफ के वैज्ञानिक उनके स्थापित होने के बारे में शोध करेंगे। संभवत यह काम देहरादून के वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट को दिया जाएगा। इसी संस्थान द्वारा इनके विलुप्त होने के कारणों पर भी शोध किया गया था। जब वैज्ञानिक इस बात की पुष्टि कर देंगे कि चीते पूरी तरह से यहां के वातावरण के लिए अभ्यस्त हो गए हैं और उनका स्थापित होने की पुष्टि होगी फिर इसके पर्यटन की योजना के अनुसार पर्यटक चीतों को देख सकेंगे।
तेंदुए चीता के लिए खतरा, लेकिन दक्षिण अफ्रीका में ऐसा नहीं
तेंदुओं को यहां चीते के लिए खतरा माना जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों की मानें तो जिन देशों से भारत में चीते लाए जा रहे हैं वहां ऐसी स्थिति नहीं है। दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया में चीतों की बसाहट की जगह पर टाइगर भी रहते हैं और तेंदुए भी, लेकिन उनसे इनकी आबादी पर कोई असर नहीं पड़ा है। ऐसे में माना जा रहा है कि यहां भी तेंदुए उनको नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे। तेंदुए चीते से अधिक शक्तिशाली होते हैं, लेकिन तेजी के मामले में चीते से काफी पीछे रहते हैं।
छोटी-छोटी तैयारियों पर फोकस
चीतों को लाने के लिए मुख्य इंतजाम पूरे किए जा चुके हैं। सूत्रों की मानें तो अभी कई बारीकियां हैं जिनके बारे में विशेषज्ञ थोड़ा चिंतित हैं। चीतों को जब यहां लाया जाएगा तो उनके सैंपल लिए जाएंगे। साथ ही उन्हें क्वारंटाइन रखा जाएगा। इसके साथ ही उनके कुछ टेस्ट भी होंगे क्योंकि इस बात की भी चिंता सता रही है कि कहीं यह अपने साथ कोई वायरस न ले आएं। चीतों के आने के साथ देश की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है इसलिए अधिकारी किसी तरह का कोई रिस्क नहीं लेना चाहते हैं। उनकी दवाओं आदि के बारे में भी अभी स्थानीय स्तर पर अधिक जानकारी नहीं है।
चीतों का ट्रांसपोर्टेशन सबसे बड़ी चुनौती
चीतों को स्थापित करने में सबसे बड़ी चुनौती उनका ट्रांसपोर्टेशन है। वन विभाग से जुड़े अधिकारियों की मानें तो पूर्व में यह देखा गया है कि चीतों को शिफ्ट करते समय हानि की आशंका 50 फीसद तक रहती है। उन्हें दो दिन तक पहले भूखा भी रखा जाता है। लैंडिग के समय भी चीतों को परेशानी आती है। दूसरी ओर अभी भारत में दिल्ली आने के बाद उन्हें कूनो पालपुर तक लाए जाने का प्लान केंद्र सरकार ने तय नहीं किया है।
इनका कहना है..
चीता को भारत में सथापित करने के लिए कूनो में 500 हेक्टेयर में बाड़ा बनाया गया है। पहले फेज में 10 से 15 चीते आ सकते हैं। अभी चीतों के आने की तारीख के बारे में शासन से कोई निर्देश नहीं मिले हैं। जब चीते पूरी तरह से स्थापित हो जाएंगे उसके बाद ही पर्यटन के प्लान के अनुसार पर्यटक उन्हें देख सकेंेगे।
- सीएस निनामा, सीसीएफ सिंह परियोजना






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