शिवपुरी। जिले के पोहरी ब्लॉक के ग्राम पटपरी की 60 वर्षीय जमुना आदिवासी ने विपरीत परिस्थितियों और गंभीर बीमारी के बावजूद हिम्मत नहीं हारी। अंधविश्वास, गरीबी और पलायन की मजबूरी के बीच टीबी जैसी गंभीर बीमारी से जूझते हुए आखिरकार उन्होंने इसे मात दे दी। स्वास्थ्य विभाग और विकास संवाद संस्था के सहयोग से आज जमुना न केवल स्वस्थ हैं बल्कि आत्मनिर्भरता की ओर भी कदम बढ़ा रही हैं।
अंधविश्वास और पलायन से बढ़ी परेशानी
जमुना आदिवासी के परिवार में 10 सदस्य हैं और उनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। परिवार के पास केवल 5 बीघा पथरीली और असिंचित जमीन है, जिससे गुजारा मुश्किल था। मजबूरी में परिवार को मजदूरी के लिए दूसरे जिलों में पलायन करना पड़ता था। इसी दौरान जमुना टीबी की चपेट में आ गईं। जानकारी के अभाव में उन्होंने बीमारी को जादू-टोना समझ लिया और इलाज से दूरी बना ली। 27 जनवरी 2025 को इलाज शुरू हुआ, लेकिन काम की तलाश में दोबारा पलायन के कारण दवाइयां बीच में ही छूट गईं, जिससे उनकी हालत और गंभीर हो गई।
स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता से मिली राहत
पलायन से लौटने के बाद विकास संवाद संस्था के स्वयंसेवक जगन्नाथ ने जमुना की गंभीर स्थिति की जानकारी स्वास्थ्य विभाग को दी। बीएमओ डॉ. दीक्षांत गुधेनिया के मार्गदर्शन में उनके उपचार को प्राथमिकता दी गई। एसटीएस मनोज कुशवाह ने नियमित दवा उपलब्ध कराने, लगातार फॉलोअप करने और उचित खान-पान की सलाह देने में अहम भूमिका निभाई। उनकी मदद से जमुना का ‘निक्षय पोषण योजना’ में पंजीयन कराया गया, जिससे उपचार के दौरान उन्हें 3 हजार रुपये की आर्थिक सहायता सीधे बैंक खाते में मिली।
पोषण और स्वरोजगार से बदली जिंदगी
डॉक्टरों के अनुसार टीबी के इलाज में पोषण का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसे ध्यान में रखते हुए विकास संवाद संस्था ने जमुना के घर के आंगन में ‘पोषण वाटिका’ तैयार करवाई, जिससे परिवार को ताजी और जैविक सब्जियां मिलने लगीं। साथ ही उन्हें मुर्गी पालन से जोड़ा गया, जिससे पोषण के साथ-साथ आय का साधन भी मिला।
लगातार दवा, बेहतर पोषण और सरकारी सहायता का ही परिणाम रहा कि 12 जनवरी 2026 को जमुना की जांच रिपोर्ट टीबी नेगेटिव आई और वे पूरी तरह स्वस्थ हो गईं। जमुना की यह कहानी अंधविश्वास छोड़कर समय पर इलाज और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने की प्रेरणा देती है।







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