शिवपुरी से मानवता को शर्मसार कर देने वाली खबर है. कुपोषण से जूझती मासूम बच्ची की ज़िला अस्पताल में मौत हो गई. जिला अस्पताल में इलाज शुरू होने से पहले ही बुझ गई नन्हीं सी ज़िंदगी.
बता दें की अस्पताल के बरामदे में मासूम बच्ची का रो-रो कर माँ का बुरा हाल था। उसकी गोद में मासूम की ठंडी देह पड़ी थी. आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे।
माँ फूट-फूट कर चीख रही थी
‘मेरी बच्ची भूख से मर गई… किसी ने नहीं सुनी मेरी…’
कभी बिलख कर कहती—
‘अगर आंगनबाड़ी ने ध्यान दिया होता… तो मेरी गुड़िया आज ज़िंदा होती।’
घर वाले भी इलाज के खिलाफ थे। बेबस माँ की पुकार अनसुनी रह गई… और आख़िरकार मासूम ने दम तोड़ दिया।
इसी बीच कवरेज करने पहुँचे पत्रकार अंकित शाक्य।
लेकिन अस्पताल के गार्ड ने रोका। पत्रकार ने जब सिविल सर्जन वी.एल. यादव को फ़ोन किया… तो मिला तुगलकी फ़रमान—
‘रिकॉर्डिंग करनी है तो पहले लिखित अनुमति लाओ।’
यानी पत्रकारिता की आवाज़ को दबाने की खुली कोशिश।
मीडिया पर हमला… लोकतंत्र पर प्रहार।
➡️ शिवपुरी जिले में 94 हज़ार से ज़्यादा बच्चे स्टंटिंग यानी कद-काठी रुकने की बीमारी से जूझ रहे हैं।
➡️ 86 हज़ार बच्चे अंडरवेट हैं।
➡️ और 13 हज़ार से ज़्यादा गंभीर रूप से बीमार (Severely Wasted) श्रेणी में आते हैं।
पूरे मध्य प्रदेश की तस्वीर और भी भयावह है।
➡️ यहाँ 1 लाख 36 हज़ार बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।
➡️ इनमें से करीब 30 हज़ार बच्चे गंभीर कुपोषण से जूझ रहे हैं।
➡️ राज्य में कुपोषण की दर 7.79% है, जबकि राष्ट्रीय औसत सिर्फ 5.40%।
यह हालात तब हैं, जब हाईकोर्ट ने सरकार को चार हफ़्तों में रिपोर्ट सौंपने के आदेश दिए हैं।
लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यही है—
रोज़ाना हर बच्चे पर सिर्फ़ 8 से 12 रुपये का पोषण बजट।
इतने पैसों में न दाल मिलती है… न दूध… तो पोषण कैसे मिलेगा?
आंकड़े चीख रहे हैं।
माँ की चीखें गूंज रही हैं।
लेकिन सिस्टम अब भी सो रहा है।
सरकार जवाब दो…
कितनी मासूम ज़िंदगियाँ और जाएँगी?
जनता अब चुप नहीं बैठेगी।”







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