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लोकसभा टिकट न देने की सलाह हारे हुए नेताओं को: विधायक को सबक सिखाया मण्डल अध्यक्ष ने, 3 MLA की गलतफहमी दूर की अफसर ने /#राजस्थान

जयपुर

सत्ता वाली पार्टी से लेकर विपक्षी पार्टी तक लोकसभा चुनाव की टिकटों को लेकर मंथन का दौर चल रहा है। सत्ता वाली पार्टी में विचार परिवार यानी संघ का फीडबैक भी मायने रखता है।

कुछ पदाधिकारियों ने हाल ही यह राय दी है कि विधानसभा हारे हुए नेताओं को लोकसभा में मौका नहीं दिया जाए। इसके पीछे तर्क दिया कि इससे नए कार्यकर्ता आगे नहीं आ पाएंगे।

इस सलाह पर कितना अमल होगा, यह कहना अभी जल्दबाजी होगा, लेकिन इसे लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। हालांकि विधानसभा हारे हुए कई नेता लोकसभा जीतते रहे हैं।

विधायक को मंडल अध्यक्ष ने सिखाया सबक

सत्ता वाली पार्टी में कैडर सिस्टम मजबूत होने के साथ ग्रासरूट लेवल तक संगठन के नियम कायदे भी चलते हैं। सत्ता वाली पार्टी के विधायक ने अपने दफ्तर पर ही संगठन से जुड़ी बैठक बुला ली। एक दो बार विधायक के दफ्तर पर ही संगठन से जुड़ी बैठकें होने लगीं। यह बात एक मंडल अध्यक्ष को नागवार गुजरी।

मंडल अध्यक्ष ने विधायक से दो टूक कह दिया कि संगठन के दफ्तर आइए, विधायक के दफ्तर में संगठन की बैठक नहीं होगी। मंडल अध्यक्ष ने यह भी तंज कसा कि आपने संगठन में काम नहीं किया, पहले आप संगठन की रीति नीति सीखिए।

विधायक ने मंडल अध्यक्ष की सलाह मानते हुए खुद के दफ्तर की जगह संगठन के दफ्तर पर ही बैठक करने में भलाई समझाी। अब मंडल अध्यक्ष घूम-घूमकर विधायक को सबक सिखाने का पूरा वाकया सुना रहे हैं।

बड़े अफसर ने दूर की तीन विधायकों की खुशफहमी

पिछले दिनों सत्ता के सबसे बड़े दफ्तर में तीन विधायक राज का प्रैक्टिकल एहसास करने पहुंचे। तीनों विधायक जोश में थे। नई-नई सत्ता आई है, इसलिए बड़े अफसर के पास कामों की लिस्ट लिए पहुंचे। तीनों का बड़े अफसर ने बड़ा आदर किया तो हौसला और बढ़ गया, लेकिन उनकी यह खुशफहमी कुछ ही देर तक रही।

बड़े अफसर ने तीनों विधायकों को टरका दिया और स्टाफ के पास भेज दिया और वहां अपने कामों की लिस्ट देने को कहा। अब जो काम टॉप लेवल से ही हो सकते हैं, उनका स्टाफ क्या कर सकता है? बड़े अफसर ने टकराव की जगह कूटनीति से काम लिया। आदर सत्कार पूरा किया, लेकिन काम नहीं किया, मना भी खुद नहीं किया।

अंगद के पैर बन गए एक विभाग के अफसर

नई सत्ता आने के बाद अफसर और कर्मचारियों की अदला बदला पुरानी परंपरा है। इसी परंपरा के तहत सत्ता के सबसे बड़े दफ्तर से लेकर जिलों तक बड़े अफसर बदले जा चुके हैं।

सब विभागों में बदलाव हुए, लेकिन खजाने और नई तकनीक वाले महकमे के आधा दर्जन से ज्यादा अफसर जस के तस बने हुए हैं। एक अफसर को हटाने के लिए आदेश आए तो उन्हें विभाग के अंडर आने वाले एक कॉर्पोरेशन से हटाया, लेकिन विभाग नहीं बदला। खजाने वाले महकमे के अफसरों का जस का तस बने रहना चर्चा का मुद्दा बना हुआ है।

मंत्रियों पर फटकार का असर

पिछले दिनों प्रदेश के दौरे पर आए सत्ता वाली पार्टी के चाणक्य के दौरे की गूंज अब तक है। तीन मंत्रियों को फटकार पड़ने के बाद सभी नेता और मंत्री सजग हो गए हैंं।

सबने लोकसभा चुनावों में दी हुई जिम्मेदारियों को संभाल लिया। लोकसभा कमेटियां, पन्ना प्रमुख, बूथ कमेटी से लेकर लोकसभा चुनाव कार्यालय खुलने तक के कामों पर फोकस कर लिया है।

हर कमेटी के जिम्मेदार लोगों के नाम और डेटाशीट तक अपने पास रख ली है। पता नहीं कब क्या पूछ ले और भरी बैठक में भद पिट जाए। सत्ता वाली पार्टी के चाणक्य ने जिस अंदाज में तीन मंत्रियों को लाइन लगाकर सवाल जवाब किए उसे लेकर पार्टी का एक खेमा भारी खुश है।

राज बदला, लेकिन रिवाज नहीं

प्रदेश में राज बदल गया लेकिन कई मामलों में रिवाज नहीं बदला। सत्ता वाली पार्टी के कई नेता बड़ी उम्मीद लगाए थे कि अब उनका ही डंका बजेगा, लेकिन सोचने से क्या होता है? ग्राउंड रियलिटी कुछ अलग ही होती है। पिछले दिनों कुछ नेताओं को रिवाज नहीं बदलने का एहसास भी हो गया।

नेताओं ने काम के सिलसिले में पहले प्रदेश के मुखिया को फोन लगाया। वहां से अच्छा रेस्पोंस मिला तो हौसला बढ़ा। जिन अफसरों से जुड़ा काम था, उन्हें फोन लगाया तो बार बार कोशिश के बावजूद बातचीत नहीं हो पाई। अब ये नेताजी वही बात दोहराते सुनाई दे रहे हैं जो आज के विपक्ष वाले सत्ता में रहते किया करते थे, मतलब सत्ता की चाल और रिवाज एक सा ही रहता है।

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