खनियाधाना – खनियांधाना नगर मे विराजमान गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज जी के परम शिष्य ओजस्वी बक्ता 108 मुनि श्री विशोक सागर जी महाराज एवं 108 मुनि श्री विधेय सागर जी महाराज जी का वर्षा योग श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन बडा मंदिर जी में चल रहा है । मुनि श्री विशोक सागर जी महाराज जी के द्वारा अनावरत ज्ञान धारा का प्रवहान किया जा रहा है ।इसमें अनेक भव अवहान का अपने जीवन को सुधारनें का प्रयास कर रहे है । मुनि श्री के सानिध्य मे शनिवार को मन्दिर जी मे 24 धण्टे का णमोकार महामंत्र का अखण्ड पाठ शुरु हुआ था जिसका 1/10/17 रविवार को समापन्न हुआ । समापन्न के बाद अभिषेक.शान्तिधारा. पूजन किया गया। मुनि श्री द्वारा प्रवचन मे णमोकार महामंत्र का महत्व श्रावको वताते हुऐ कहा कि आचार्य कुंद कुंद समयसार में कहा है समयसार का नाम लेते ही आत्मा का सार है। जिनवाणी से बडा आनंद आता है सुख मिलता है ,आत्म शांति मिलती है ,आत्म शांति का मार्ग प्रषस्त करता है। जिनवाणी चार रुप में बटी है। प्रसन्त दशा वह दशा है जिसमें व्यक्ति प्रमाद से सहित है और अप्रमत्त का अर्थ है सातवा गुण स्थान जो निरविकल्प को पाता हो। वह अप्रमत्त दषा होती है। प्रमत्त का अर्थ है सविकल्प कोई भी कार्य आता है और उसे पता नहीं चलता है मन के अंदर मन छिपा रहता है। यदि मन अच्छा होता है तो सिद्धि प्राप्ति हो जाती है। और जिसका मन अच्छा नहीं होता है तो काम की सिद्धि नहीं होती है। शास्त्रों में अंजन चोर का उदाहरण आता है जो कि तदभव मोक्ष गामी जीव था लेकिन उसके पहले वह बहुत बडा व्यसनी था। वह वैष्या के पास जाता था। वैष्या ने कहा कि सच्चा प्रेम तव समझूगी जब तुम रानी का हार लेकर आओगे। यह सुनकर चोर शीघ्र जाता है और रानी का हार चुराकर भाग जाता है लेकिन उस हार की चमक से सबको पता चल जाता है और उसको पकडने के लिए पीछा करते है यह देखकर चोर जंगल में चला जाता हे और शमषान में चला जाता है। वहॉ पर एक श्रेष्ठी पुत्र मंत्र सिद्धि कर रहा था उसकी उस पंच प्रकार की प्रक्रिया को देखकर मंत्र सिद्ध करने की विधि पूछी और श्रेष्ठी पुत्र ने उसको विधि बता दी। उसको ण्मोकार मंत्र सुना दिया। लेकिन अंजन चोर वह मंत्र भूल जाता है तो वह कहता है आडम, ताडम कुछ न जानम सेठ वचन प्रमाणम कह कर एक साथ छुरी से रस्सियों को काट देता है वह सिद्धि को प्राप्त कर लेता है क्योंकि उसको सेठ के वचन में श्रद्धा थी आस्था थी इसलिए उसे आकाषगामणी विद्या प्राप्त हो जाती है। इसलिए कुंद कुंद आचार्य कहते है कि तुम णमोकार मंत्र को पढ लेते हो लेकिन उसका कुछ प्रभाव नहीं पडता है। उसका कारण है मन का उस क्रिया में न लगना कार्य की सिद्धि नहीं होती है। भले ही साधना कम करना लेकिन श्रद्धा से आस्था से करोगे तो सौ गुनी साधना से एक गुनी साधना अच्छी होती है। णमोकार महामंत्र में संपूर्ण द्वादंशाग का सार भरा हुआ है। णमोकार महामंत्र समस्त शक्तियों का खजाना है। णमोकार महामंत्र आत्म शांति का आमोध साधन है। णमोकार महामंत्र समस्त के विपत्तियों को हरने वाला है णमोकार महामंत्र संपूर्ण समस्याओं का समाधान है नमोकार महामंत्र असंतोष को संतोष में परिवर्तित परिवर्तित करता है णमोकार महामंत्र समस्त विघ्न बाधाओं को हरण करने वाला है। णमोकार महामंत्र’ एक लोकोत्तर मंत्र है। इस मंत्र को जैन धर्म का परम पवित्र और अनादि मूल मंत्र माना जाता है। इसमें किसी व्यक्ति का नहीं, किंतु संपूर्ण रूप से विकसित और विकासमान विशुद्ध आत्मस्वरूप का ही दर्शन, स्मरण, चिंतन, ध्यान एवं अनुभव किया जाता है। इसलिए यह अनादि और अक्षयस्वरूपी मंत्र है। लौकिक मंत्र आदि सिर्फ लौकिक लाभ पहुँचाते हैं, किंतु लोकोत्तर मंत्र लौकिक और लोकोत्तर दोनों कार्य सिद्ध करते हैं। इसलिए णमोकार मंत्र सर्वकार्य सिद्धिकारक लोकोत्तर मंत्र माना जाता है। इस महामंत्र को जैन धर्म में सबसे प्रभावशाली माना जाता है। ये पाँच परमेष्ठी हैं। इन पवित्र आत्माओं को शुद्ध भावपूर्वक किया गया यह पंच नमस्कार सब पापों का नाश करने वाला है। संसार में सबसे उत्तम मंगल है।






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