प्राईवेट स्कूल संचालक प्रतिवर्ष स्कूल ड्रेस तथा कोर्स बदलकर अभिभावकों
की बड़ा रहे हैं मुशिवत, अभिभावको इनकी मनमानी के आगे होना पड़ता है
नतमस्तक। अभिभावक अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए उन्हे अच्छी शिक्षा
प्रदान कराना चाहते हैं जिससे उनका भविष्य सफलताओं से भरा रहे। लेकिन इस
दौर में अभिभावक अच्छी शिक्षा के लिए प्राईवेट स्कूल संचालकों की मनमानी के
आगे नतमस्तक होते नजर आते हैं। प्राईवेट स्कूल संचालक अपने बिजनेस को
प्रतिबर्ष बढ़ाने की फिराक में नया कोर्स व नऐ स्कूल ड्रैसों को अपनी
चुनिंन्दा दुकान पर रख देते हैं और एक मात्र दुकान पर सामान उपलब्ध होने की
बजह से वह मनचाहे दामों में बेचते नजर आते हैं जिसका सीधा असर माता-पिता
की जेब पर पड़ता है। उल्लेखनीय है अभिभावकों को अपने बच्चों को पढ़ाने के
लिए चिंता सताने लगती है। और यह बात तो सभी को ज्ञात है कि इस बर्ष में
अपनी मूलभूत जरूरतों को पूरा करने में कितनी परेशानी उठानी पड रही है बारिश
के इस सीजन में बाजारों में मंदी के चलते सबके रोजगार प्रभावित होने लगते
हैं और इसी क्रम में बच्चों को पढाने की चिंता माता-पिता को सताने लगती है।
क्योंकि अब बच्चों को शिक्षा दिलाना इतना आसान नहीं है प्राईवेट स्कूलों
की जरुरतों को पूरा करना अब अभिभावकों एक चुनौति से कम नहीं है। जानकारी के
अनुसार बदरवास नगर में इन दिनों प्राईवेट स्कूलों की संख्या 50 से अधिक है
जिनमें से कुछ तो बिना मान्यता के ही चालू हैं। इस बर्ष प्राईवेट स्कूलों
की संख्या सबसे अधिक बड़ी है लोगों ने शिक्षा को बिजनेस का एक हिस्सा बना
लिया है और बिना मान्यता व बिना उपादी प्राप्त शिक्षकों दृ।रा बडे ही
विश्रित रुप से यह बिजनेस किया जा रहा है। जिनके तरफ प्रशासनिक अधिकारियों
कि निगांहें नहीं जाती या छुपा ली जाती है यह कहना अभी कठिन है। सूत्रों की
मानें तो बदरवास में संचालित स्कूलों का निरीक्षण होना बदरवास शिक्षा
विभाग की पोल खोलकर रख देगा। अब देखना यह है कि शिक्षा विभाग किस तरह अपने
कार्रवाई के कदमों को आगे बढ़ाता है।
एलकेजी और यूकेजी के बच्चे बैग के बोझ से दबे
प्राईवेट
स्कूल संचालक अब स्कूली बिजनेस में इतना तक भूल गए हैं कि जिस एलकेजी और
यूकेजी क्लास के बच्चों में जितना बजन होता है, उतने से आधा बजन तो अब उनकी
किताब व कॉफियों में है जिन्हें वह प्रतिदिन अपने नाजुक कन्धो पर लादकर
स्कूल जाने को विवश हैं।
स्कूल संचालक अब स्कूली बिजनेस में इतना तक भूल गए हैं कि जिस एलकेजी और
यूकेजी क्लास के बच्चों में जितना बजन होता है, उतने से आधा बजन तो अब उनकी
किताब व कॉफियों में है जिन्हें वह प्रतिदिन अपने नाजुक कन्धो पर लादकर
स्कूल जाने को विवश हैं।





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