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दिगाम’ से वर्षों लड़ते रहे जंग, आखिर जीते और अब मुस्कुरा उठी जिंदगी,


ग्वालियर। जो देखता दुत्कार देता, दर-दर की ठोकर खाकर भटकते रहते। दिमाग पर काबू नहीं था तो परिवार ने भी ठुकरा दिया। अपने-पराए जब एक जैसे हो गए तो उस पुरानी जिंदगी में लौटने की सारी उम्मीदें टूट चुकीं थीं। लेकिन यहीं सब खत्म नहीं हुआ। खुद के लड़े। दिमाग पर काबू पाया और आज लगभग गुमनाम हो चुकी जिंदगी को फिर नई पहचान दे दी। जी हां लगभग असंभव से लगने वाली ऐसी तमाम कहानियां देश की ख्यात ग्वालियर आरोग्य शाला के पीछे बुनी जा रही हैं। नये साल पर नईदुनिया लाया है व्यक्ति के खुद से संघर्ष और उस पर विजय पाने के अनूठे उदाहरण।
दुत्कार ,नफरत, संघर्ष के हैप्पी एन्डिंग की चार कहानियां
1- आशा: गर्भवती आई,बेटे को जन्म दिया,तलाकशुदा पति ने अपनाया
पति से तलाक के बाद आशा का अफेयर हुआ जिससे गर्भवती हो गई । प्रेमी ने ठुकराया तो मानसिक बीमार होकर सड़कों पर लावारिस भटकने लगी। नवंबर 2011 में पुलिस ने भर्ती कराया। आते ही बेटा पैदा हुआ जिसे शिशु गृह भेज दिया। आशा का ट्रीटमेंट शुरु हुआ तो सब भूल चुकी आशा को धीरे धीरे याद आने लगा। पहले याद आया उसका बेटा। आरोग्यशाला प्रबंधन से जब आशा की जिद बढ़ी तो बेटे को मिलवाने बुलाया और हर साल उसका जन्मदिन बुलाकर मनाने लगा। पांच साल इलाज के बाद 2016 तक आशा काबिल होने के साथ साथ सब याद कर चुकी थी। किस्मत ने पूरा साथ दिया तो बेटे सहित आशा को तलाकशुदा पति ने अपना लिया। अब वह अपनी जिंदगी पहले से बेहतर जी रही है।
2- रांची गया फोन तो पिता फूट फूटकर रोने लगे 
2016 में दतिया से पुलिस मानसिक विक्षिप्त निखिल को अस्पताल लेकर आई थी। उसके साथ अजीब बात यह कि चुप ही रहता था। आने के बाद आरोग्यशाला में इलाज मिला तो सुबह शाम नियमित काम करने लगा। दिसंबर 2017 में निखिल की चुप्पी टूटते ही पहचान भी वापस मिल गई। निखिल को सब याद आ गया। पता चला कि वह रांची का रहने वाला है। खबर पिता तक पहुंची। बेटे की खोज में दर दर भटकने वाले पिता के पास जैसे ही आरोग्यशाला से फोन गया वह फफक कर रो पड़े। दौड़े दौड़े ग्वालियर पहुंचे। नववर्ष पर बेटे का तोहफा उन्हें आरोग्यशाला से मिल गया।
3- अपनों ने नफरत से ठुकराया,नई जिंदगी मिली तो नेहा को अपनाया
मई 2014 में मानसिक आरोग्यशाला में आई 18 साल की नेहा मानसिक संतुलन पूरी तरह खो चुकी थी। महाराष्ट्र से ग्वालियर तक कैसे पहुंची,कुछ पता नहीं था। दो साल के ट्रीटमेंट से नेहा जिंदगी का पाठ सीखने लगी थी। खोई अपनी दुनिया भी याद आ गई थी। नेहा ने जैसा जहां पता बताया तो वहीं निकला। बिन मां की बेटी नेहा सौतेली मां से परेशान होकर मानसिक संतुलन खो बैठी थी। पिता को नेहा के ठीक होने की खबर दी तो आए और बिटिया को वापस ले गए। परिवार ने नेहा के लौटने की उम्मीद खो ही दी थी।
4- खुद नहीं संभल रही थी अब टीचर बनकर मरीजों को पढ़ाने लगी-
2013 में दमोह से पुलिस प्रीति (30साल) को भर्ती कराके गई थी। मारपीट और चिल्लाना उसका रोज का काम था। उपचार के साथ साथ लगातार काउंसलिंग हुई तो प्रीति में इतना बदलाव आया कि न सिर्फ सिलाई-कढ़ाई सीख ली बल्कि मरीजों को पढ़ाने तक लगी। यह बदलाव देख प्रबंधन भी हैरत में था। चार साल बाद 2017 में एक दिन प्रीति को अपना घर-परिवार सब याद आ गया। भाई तक खबर पहुंची और आज प्रीति अपनी पहले वाली जिंदगी में लौटकर सकुशल है।
यहां सीख रहे आत्मनिर्भर होने का पाठ
मानसिक आरोग्यशाला में पदस्थ मेडिको सोशल वर्कर अमिता श्रीवास्तव और थेरेपिस्ट दीपा लक्षवानी ने बताया कि यहां मरीजों का विकास हमारी प्राथमिकता रहती है। आर्ट,क्रॉफ्ट से लेकर छोटी छोटी ऐसी चीजें सिखाई जातीं है जो मरीजों को आत्मनिर्भर बनातीं हैं। खेल खिलाए जाते हैं,प्रतियोगिताएं होतीं हैं। यहां पदस्थ असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ नंदकुमार सिंह ने बताया कि काउंसलिंग के पार्ट पर मरीज को यहां समझा जाता है,जिससे हमें भी मदद मिलती है।
पहले से बहुत कुछ बदला है
मानसिक आरोग्यशाला की लोगों के मन में तस्वीर को हमने बदलने का प्रयास किया है। यहां इलाज के साथ साथ पुनर्वास किया जाता है। अज्ञात जीवन और बिगड़ी मानसिक स्थिति में आए लोगों को नयी जिंदगी यहां दी जाती है। वे अपने अपनों तक पहुंच जाते हैं तो हमें खुशी होती है। डॉ ज्योति बिंदल, संचालक, मानसिक आरोग्यशाला, ग्वालियर
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