जबलपुर। मेरे दादू भी आर्मी में थे और मेरे पापा भी आर्मी में ही थे। अभी एक्ससर्विस मैन के रूप में पुलिस में जॉब कर रहे हैं। मैंने बचपन से ही देशभक्ति का माहौल घर में देखा है तो मुझे तो आर्मी में ही जाना है। मुझे देश के लिए कुछ करना है। देखना, एक दिन मैं भी ऐसे ही मेडल लेकर आऊंगी और आप लोग मेरा भी सम्मान करोगे। देश व सेना के प्रति अपने ऐसे ही विचारों को नईदुनिया से साझा किया 11वीं क्लास में पढ़ रही मानसी शर्मा ने। सिर्फ मानसी ही नहीं समारोह में ऐसे कई युवा व बच्चे शामिल रहे जो सैनिक परिवारों से तो हैं ही और खुद भी सेना में जाना चाहते हैं।
नहीं लगता डर
मानसी ने कहा कि मेरे पिता शारदा प्रसाद शर्मा मेरे आदर्श हैं। अभी मैें आर्मी स्कूल नंबर-2 में पढ़ रही हूं। मैंने घर पर भी सभी को बोला है कि मैं आर्मी में जाना चाहती हूं और मैं भी अभी से तैयारी में लगी हूं। मुझे पता है कि सेना में जाना कठिन है, पर मुझे डर नहीं लगता। अपने देश के लिए लड़ने मैं आर्मी में जाना चाहती हूं।बीकॉम की छात्रा जगप्रीत कौर औऱ 11वीं में पढ़ने वाले चरणजीत सिंह ने कभी अपने दादा सरदार सिंह को नहीं देखा। लेकिन उनके किस्से वे रोज अपने मन में गुनते रहते हैं। वे कहते हैं मेरे पिता उपकार सिंह मथारू के जन्म के दो माह पहले ही वे शहीद हो गए थे। परिवार में इकलौते बेटे होने के कारण वे सेना में नहीं जा पाए, लेकिन मैं उनका सपना पूरा करना चाहता हूं। सेना में भर्ती के लिए सुबह-सुबह दौड़ लगाते हैं। परीक्षा की तैयारी भी शुरू कर दी है। बहन जगप्रीत मां को मनाने में उसका साथ दे रही हैं। वे कहती हैं हम चाहते हैं कि दादाजी का जज्बा हमारी तीसरी पीढ़ी में भी कायम रहे।
मासूम के मन में सेना में जाने का सपना
यू केजी में पढ़ने वाली अवनी पूरे मैदान में इस तरह खुश होकर घूम रही थी जैसे सारे मेडल उसे ही मिले हैं। यह उसके समझने की उम्र नहीं है, लेकिन छोटे-छोटे हाथों को ऊपर उठाकर कहती है 2022 में इतनी बड़ी हो जाऊंगी कि सेना में जाऊंगी और मेडल लेकर आऊंगी। 2022 से क्या रिश्ता है और कैसे आया…यह तो मासूम मन में दफ्न है जिसे वो शब्द नही दे पाई, लेकिन लक्ष्य साफ है…उसे भी सेना में जाना है




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