
जीवन
में सच्चा तप विषय-कषायों को छोडऩें और सद्गुणों को पाने में है। धन्य हैं
वे संत निष्पृह और निश्चिंत होकर वनो-पर्वतों पर रहकर अपने कर्मों को
जलाते हैं, और हम सबको अपने स्वभाव का परिचय कराते हैं। तप की आराधना तन से
नहीं मन से होती है। जैन दर्शन में 12 प्रकार के अंतरंग और बहिरंग तप बताए
हैं, जो साध्य और साधन के रूप में है। अंतरंग तप मन की शुद्धि के लिए होते
हैं। विषय-कषाय को छोडऩा ही तप है। नीरस भोजन करके या फलाहार करके भी यदि
तुम्हारी विषय-कषाय नहीं छूटी हैं, तो तुम्हारा तप करना व्यर्थ हैं। एक बार
भोजन की जगह भले ही दो बार भोजन कर लो, परंतु राग-द्वेष, विषयाभिलाषा का
त्याग करते हुए, आत्मा के निकट रहना ही सच्चा तप है।
में सच्चा तप विषय-कषायों को छोडऩें और सद्गुणों को पाने में है। धन्य हैं
वे संत निष्पृह और निश्चिंत होकर वनो-पर्वतों पर रहकर अपने कर्मों को
जलाते हैं, और हम सबको अपने स्वभाव का परिचय कराते हैं। तप की आराधना तन से
नहीं मन से होती है। जैन दर्शन में 12 प्रकार के अंतरंग और बहिरंग तप बताए
हैं, जो साध्य और साधन के रूप में है। अंतरंग तप मन की शुद्धि के लिए होते
हैं। विषय-कषाय को छोडऩा ही तप है। नीरस भोजन करके या फलाहार करके भी यदि
तुम्हारी विषय-कषाय नहीं छूटी हैं, तो तुम्हारा तप करना व्यर्थ हैं। एक बार
भोजन की जगह भले ही दो बार भोजन कर लो, परंतु राग-द्वेष, विषयाभिलाषा का
त्याग करते हुए, आत्मा के निकट रहना ही सच्चा तप है।
अनंत
चतुर्दशी पर्व का महत्व बताते हुये उन्होंने कहा कि- अनंत चतुर्दशी का पर्व
वर्ष में 1 दिन के लिए आता है। उस दिन भी यदि धर्म की गरिमा बनाने के लिए
घर-गृहस्थी, दुकान का मोह त्याग कर विमान महोत्सव में शामिल न हुये तो यह
दस दिन की धर्म आराधना करना हमारा व्यर्थ है। याद रखना जो धन-वैभव-विषय,
सुख की ओर भागते हैं, उन्हें वो सब कभी प्राप्त होने वाला नहीं है। और जो
इन दिनों में पुण्य-संचय कर लेते हैं, वह धर्म के क्षेत्र में तो श्रेष्ठ
बनते ही हैं, सांसारिक क्षेत्र में भी उसके सब कार्य स्वत: हो जाया करते
हैं। और मन के तपस्वी बनने से देव भी हमारा साथ देते हैं। धर्म तनबल-धनबल
या तन-मन से नहीं होता, बल्कि आत्म बल से होता है। संसार में चार प्रकार के
प्राणी होते हैं, जो उत्तम तप करता है, उसका यह भव तो अच्छा होता ही है,
परभव भी अच्छा बनता है। अत: हम अपनी इच्छाओं को रोककर, निष्पृह और
नि:कांक्षित जीवन जिएँ। उत्तम-तप सम्यग्दर्शन का प्रतीक है। अब कुछ पाने को
नहीं, बल्कि कुछ खोने को तपें। सच्चे भक्त वही हैं, जो प्रभु और गुरु के
प्रति बहुमान और समर्पण रखते हैं। ऐलक श्री विवेकानंद सागर जी महाराज ने
कहा कि- मार्ग दो प्रकार के होते हैं, साधना का और साधनों का। साधनों का
मार्ग वाह्य चेतना से जुड़ा होता है, जो हमें पतन की ओर ले जाता है, जबकि
साधना का मार्ग अंतरंग चेतना से जुड़ता है, जो निवृत्ति प्रधान होता है।
साधना के माध्यम से अपनी इच्छाओं को रोककर, जीवन को पवित्र करने का नाम ही
तप है। आवश्यकता तो गरीबों की भी पूरी हो जाती है, पर आकांक्षाएं अमीरों
तथा राजा-महाराजाओं की भी पूरी नहीं होती। हम अपनी आवश्यकताओं के लिए तो
जिएँ परन्तु इच्छाओं और कामनाओं के लिए जीना केले के छिलके पर पैर रखने
जैसा है, जो नियम से वो गिरायेगा ही गिरायेगा। इसलिए हम इस जीवन इसरूप
बनाएं। ऐसे तपस्वी-महापुरुष जिनके जीवन में धर्म, सत्य, तप, ज्ञान, विवके,
शांति, सदाचार और सहयोग होता है, वह सदा वंदनीय होते हैं।
चतुर्दशी पर्व का महत्व बताते हुये उन्होंने कहा कि- अनंत चतुर्दशी का पर्व
वर्ष में 1 दिन के लिए आता है। उस दिन भी यदि धर्म की गरिमा बनाने के लिए
घर-गृहस्थी, दुकान का मोह त्याग कर विमान महोत्सव में शामिल न हुये तो यह
दस दिन की धर्म आराधना करना हमारा व्यर्थ है। याद रखना जो धन-वैभव-विषय,
सुख की ओर भागते हैं, उन्हें वो सब कभी प्राप्त होने वाला नहीं है। और जो
इन दिनों में पुण्य-संचय कर लेते हैं, वह धर्म के क्षेत्र में तो श्रेष्ठ
बनते ही हैं, सांसारिक क्षेत्र में भी उसके सब कार्य स्वत: हो जाया करते
हैं। और मन के तपस्वी बनने से देव भी हमारा साथ देते हैं। धर्म तनबल-धनबल
या तन-मन से नहीं होता, बल्कि आत्म बल से होता है। संसार में चार प्रकार के
प्राणी होते हैं, जो उत्तम तप करता है, उसका यह भव तो अच्छा होता ही है,
परभव भी अच्छा बनता है। अत: हम अपनी इच्छाओं को रोककर, निष्पृह और
नि:कांक्षित जीवन जिएँ। उत्तम-तप सम्यग्दर्शन का प्रतीक है। अब कुछ पाने को
नहीं, बल्कि कुछ खोने को तपें। सच्चे भक्त वही हैं, जो प्रभु और गुरु के
प्रति बहुमान और समर्पण रखते हैं। ऐलक श्री विवेकानंद सागर जी महाराज ने
कहा कि- मार्ग दो प्रकार के होते हैं, साधना का और साधनों का। साधनों का
मार्ग वाह्य चेतना से जुड़ा होता है, जो हमें पतन की ओर ले जाता है, जबकि
साधना का मार्ग अंतरंग चेतना से जुड़ता है, जो निवृत्ति प्रधान होता है।
साधना के माध्यम से अपनी इच्छाओं को रोककर, जीवन को पवित्र करने का नाम ही
तप है। आवश्यकता तो गरीबों की भी पूरी हो जाती है, पर आकांक्षाएं अमीरों
तथा राजा-महाराजाओं की भी पूरी नहीं होती। हम अपनी आवश्यकताओं के लिए तो
जिएँ परन्तु इच्छाओं और कामनाओं के लिए जीना केले के छिलके पर पैर रखने
जैसा है, जो नियम से वो गिरायेगा ही गिरायेगा। इसलिए हम इस जीवन इसरूप
बनाएं। ऐसे तपस्वी-महापुरुष जिनके जीवन में धर्म, सत्य, तप, ज्ञान, विवके,
शांति, सदाचार और सहयोग होता है, वह सदा वंदनीय होते हैं।






Be First to Comment