
खनियांधाना।
नगर के श्री पाश्र्वनाथ दि. जैन बड़ा मंदिर में चल रहे पावन वर्षायोग में
प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से ज्ञानगंगा की वर्षा हो रही है जिसमें आज
शनिवार को हुए प्रवचनों में मुनिश्री विशोक सागर जी ने कहा कि इस संसार में
व्यक्ति अपने दुखों से दुखी नहीं है बल्कि दूसरों के सुख देखकर ज्यादा
दुखी हो रहा है।
नगर के श्री पाश्र्वनाथ दि. जैन बड़ा मंदिर में चल रहे पावन वर्षायोग में
प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से ज्ञानगंगा की वर्षा हो रही है जिसमें आज
शनिवार को हुए प्रवचनों में मुनिश्री विशोक सागर जी ने कहा कि इस संसार में
व्यक्ति अपने दुखों से दुखी नहीं है बल्कि दूसरों के सुख देखकर ज्यादा
दुखी हो रहा है।
मेरी भावना का भावार्थ बताते हुये कहा कि जीव दो
प्रकार के होते है पहले संसारी एवं दूसरे वह जीव हैं जो इस संसार से पार
हो गये है जिन्होंने अपने पुरूषार्थ के बल पर राग द्वेश रहित अवस्था
प्राप्त कर मोक्ष महल में प्रवेश कर लिया है जहां निराकुलता ही निराकुलता
है , इन्द्रिय जनित सुख नहीं वरन सम्पूर्ण सुख ही सुख है। पूज्य मुनि श्री
ने कहा कि संसार में रहने वाले जीव राग द्वेश से रंजित रहने के कारण सदा
दुखी रहते है जिनके सुख के सभी साधन मौजूद है व हमें बाहर से सभी प्रकार से
सुखी दिखाई देते हैं उनके अन्तरमन की स्थिति जानने से ज्ञात होगा कि वह
हमसे ज्यादा दुखी है। मन में आकुलता होने से तथा दृष्टि परलक्षित होने से
अपने पास जो सुख का खजाना है उसे भूल कर दूसरो के संसाधनों को देखकर दिनरात
उन्हें पाने की लालसा में दुखित हो रहे हैं ।जग में प्रसिद्वि दो प्रकार
की होती है एक विख्यात एक कुख्यात भगवान राम का नाम प्रसिद्व है तो रावण की
भी प्रसिद्वि नारायण कृष्ण का नाम आज जन जन की जुवां पर है तो कंस को कहां
भूल पाये है जहां सती सीता का नाम सम्मान से लेते है तो सूर्पणखा के कर्म
भी आज चर्चा में है। इसलिये हम अगर प्रसिद्वि की चाह में ही लगाना चाहे तो
कम से कम भगवान राम, नारायण कृष्ण, सती सीता के रूप में प्रसिद्धि पाने का
लक्ष्य वनायें। हम बैर पाप अभियान भरे जीवन को त्याग कर सबका कल्याण हो,
सभी जीव सुखी रहें, किसी के प्रति मेरा द्वेष न वने, मेरा जीवन परोपकार मय
हो ऐसी भावना प्रतिदिन प्रात: काल से ही प्रारम्भ करे यही मंगल ज्ञान है।
प्रतिदिन भगवान की भक्ति करें जिससे सारे विघ्न प्रलय को प्राप्त होंगे।
प्रकार के होते है पहले संसारी एवं दूसरे वह जीव हैं जो इस संसार से पार
हो गये है जिन्होंने अपने पुरूषार्थ के बल पर राग द्वेश रहित अवस्था
प्राप्त कर मोक्ष महल में प्रवेश कर लिया है जहां निराकुलता ही निराकुलता
है , इन्द्रिय जनित सुख नहीं वरन सम्पूर्ण सुख ही सुख है। पूज्य मुनि श्री
ने कहा कि संसार में रहने वाले जीव राग द्वेश से रंजित रहने के कारण सदा
दुखी रहते है जिनके सुख के सभी साधन मौजूद है व हमें बाहर से सभी प्रकार से
सुखी दिखाई देते हैं उनके अन्तरमन की स्थिति जानने से ज्ञात होगा कि वह
हमसे ज्यादा दुखी है। मन में आकुलता होने से तथा दृष्टि परलक्षित होने से
अपने पास जो सुख का खजाना है उसे भूल कर दूसरो के संसाधनों को देखकर दिनरात
उन्हें पाने की लालसा में दुखित हो रहे हैं ।जग में प्रसिद्वि दो प्रकार
की होती है एक विख्यात एक कुख्यात भगवान राम का नाम प्रसिद्व है तो रावण की
भी प्रसिद्वि नारायण कृष्ण का नाम आज जन जन की जुवां पर है तो कंस को कहां
भूल पाये है जहां सती सीता का नाम सम्मान से लेते है तो सूर्पणखा के कर्म
भी आज चर्चा में है। इसलिये हम अगर प्रसिद्वि की चाह में ही लगाना चाहे तो
कम से कम भगवान राम, नारायण कृष्ण, सती सीता के रूप में प्रसिद्धि पाने का
लक्ष्य वनायें। हम बैर पाप अभियान भरे जीवन को त्याग कर सबका कल्याण हो,
सभी जीव सुखी रहें, किसी के प्रति मेरा द्वेष न वने, मेरा जीवन परोपकार मय
हो ऐसी भावना प्रतिदिन प्रात: काल से ही प्रारम्भ करे यही मंगल ज्ञान है।
प्रतिदिन भगवान की भक्ति करें जिससे सारे विघ्न प्रलय को प्राप्त होंगे।






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