खनियाधाना। नगर के प्राचीन श्री पारसनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर जी में विराजमान आचार्य विराग सागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री विशोक सागर जी महाराज एवं मुनि श्री विधेयसागर जी महाराज के केशलोंच की क्रिया आज प्रात: काल मंदिर जी प्रांगण में संपन्न हुई । इस अवसर पर मुनि श्री ने उपवास रखा तथा आहार के लिए नहीं निकले ।
उल्लेखनीय है कि दिगंबर जैन मुनि अपने शरीर में बाल बढऩे पर कैंची, उस्तरे आदि का प्रयोग नहीं करते हैं तथा स्वयं अपने हाथों से अपने बाल उखाड़ते हैं ताकि ना ही किसी का सहारा लेना पड़े और ना ही किसी जीव आदि की हिंसा हो । मुनियों की इस क्रिया को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रावक जनवी मंदिर जी में उपस्थित थे तथा जब बाल उखाडऩे के साथ रक्त भी निकलने लगा यह दृश्य देख कर भक्तों की आंखों में अश्रुधारा बहने लगी कि दिगंबर जैन मुनि की क्रियाएं कितनी कठिन होती है लेकिन फिर भी वह अपने धर्म पालन में अडिग रहते हैं। जिस दिन मुनिराज केशलोंच करते हैं उस दिन वह आहार भी ग्रहण नहीं करते इसलिए आज मुनिद्वय आहार के लिए भी नगर में नहीं गए तथा उपवास रखा। इस अवसर पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने कहा कि राग अपने को रुलाता है और द्वेष दूसरों को , रोना किसे अच्छा लगता है ? किसीको नहीं तब भला रुलाना क्यों अच्छा लगना चाहिये ? हँसने-हँसाने में अर्थात् स्वयं प्रसन्नचित्त रहने और दूसरों को प्रसन्नता वितरित करने में ही जीवन की सफलता निहित है जीवन की इस सफलता के मार्ग में राग और द्वेष सबसे बड़े रोड़े हैं, जिन्हें हटाना जरूरी है। राग से हमें अपने दोष नहीं दीखते और द्वेष से दूसरों के गुण नहीं दिखते। इस प्रकार राग के कारण हम अपना सुधार नहीं कर पाते और द्वेष के कारण दूसरों से सद्गुण सीख नहीं पाते इसलिए रागद्वेष का जितना भी हो सके क्षय करने का भरपूर प्रयास करना चाहिये रागद्वेष के क्षय से ही मोक्ष प्राप्त होता है वह मोक्ष जो एकान्त सुख स्वरूप है।






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