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गुरु एवं शिष्य का संबंध बड़ा ही अटूट और एक दूसरे से आत्मीयता से जुड़ा रहता है।

खनियाधाना।  नगर के 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर जी में आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज का 25 वा रजत आचार्य पदारोहण दिवस बड़ी धूम धाम से मनाया गया जिसमें 25 जोड़ों के द्वारा सामूहिक पूजन संपन्न हुई 25 महिलाओं ने शास्त्र भेट किया 25 दीपको से  बहनों ने आरती की शाम को आचार्य श्री के जीवन चरित्र पर विशेष प्रश्न मंच एवं विलयांजलि सभा हुई अनेक लोगों ने आचार्य श्री के जीवन से जुड़े अपने अपने अनुभव सुनाएं।

शिष्य और गुरु को जोडऩे वाला सेतु है विनय। अगर विनय सेतु नहीं है तो गुरु-शिष्य में अच्छा संबंध होना कठिन है। शिष्य के लिए गुरु के प्रति कर्तव्य निष्ठा जरूरी है। शिष्यों का यह सौभाग्य होता है कि उन्हें एक पथ दर्शक अनुशासक वात्सल्य प्रदाता गुरु प्राप्त होते है। यह उद्गार मुनि श्री विशोक सागर जी महाराज ने धर्म सभा को को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शिष्य अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहे तो गुरु भी अपने शिष्यों के प्रति जागरूक रहे। दोनों में अपने-अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा होती है तो शिष्य का संबंध अच्छा रहता है। जितनी कर्तव्यनिष्ठा शिष्य की होती है उतनी कर्तव्य निष्ठा गुरु की भी होती है। गुरु एवं शिष्य का संबंध बड़ा ही अटूट और एक दूसरे से आत्मीयता से जुड़ा रहता है। सीधे तौर पर यदि देखा जाए तो यह याद और दया का पूरक है। यदि आप गुरु को याद करेंगे तो वे आप पर जरूर दया करेंगे। गुरु की दृष्टि में जीने वाला व्यकित अपने जीवन के मूल उद्देश्यों को समझ सकता है। आदमी गुरु के पास लेने जाता है, लेकिन देना कोई नहीं चाहता। लोग बिना कुछ दिए आशीर्वाद लेना भी नहीं छोड़ते। गुरु को अपने शिष्य से कोई धन-दौलत नहीं चाहिए, अगर शिष्य अपने गुरु के प्रति मन में श्रद्धा और विश्वास का भाव रखेंगे। तब गुरु अपने शिष्य को आशीर्वाद देंगे। महाराजश्री ने कहा कि अपने बड़ों से मांगने की नहीं, बल्कि देने की आदते डालनी चाहिए। आज हर व्यक्ति भगवान से मांगना या अपने संकटों को दूर करना चाहता है। लेकिन भगवान के संकट हरने कोई नहीं जाता। इस बात को महाराजश्री ने श्रीराम और हनुमानजी का उदाहरण देते हुए समझाया। उन्होंने कहा कि हनुमानजी का नाम संकटमोचन यूं ही नहीं पड़ा, हनुमानजी ने भगवान श्रीराम के प्रति अटूट श्रद्धा रखी और उनके संकटों को हरने का प्रयास किया। हनुमानजी ने अपने संपूर्ण कर्म भगवान श्रीराम को समर्पित कर दिए। इसलिए आज दुनिया श्रीरामजी से ज्यादा हनुमानजी को पूजती है और संकटमोचन का नाम भी दिया है। मुनि श्री ने कहा कि हमें दुर्योधन का भाव नहीं रखकर हनुमानजी का भाव रखना चाहिए। व्यक्ति को ऐसा बनना चाहिए कि वह अपनी समस्याएं भगवान के समक्ष नहीं रखें, बल्कि भगवान की समस्याओं के प्रति चिंता रखनी चाहिए। इसी प्रकार शिष्यों के लिए तो गुरु भगवान होते हैं तो शिष्य भी गुरु के लिए बड़े आधार होते हैं। गुरु को शिष्यों का भी अधिकतम सहारा होता है। योग्य शिष्य होने से गुरु कई कार्यों से निश्चिंत होते हैं। वे आचार्य धन्य है जिन्हें प्रखर प्रतिभा के शिष्य मिल जाते हैं। गुरु भी अपने कर्तव्यों को ध्यान में रखते हुए शिष्य की कठिनाई को समझने का प्रयास करें तथा निराकरण करने का प्रयास करें तो यह गुरु का महात्म्य होता है।

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