को शहीद का दर्जा तक नहीं दे पाए हैं जिन्होंने आजादी के लिए अपना जीवन
कुर्बान कर दिया.
हम बात कर रहे हैं भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु
को शहीद का दर्जा देने को लेकर उठने वाले सवालों का. हैरानी की बात ये है
कि राज्यसभा में इन क्रांतिकारियों को शहीद मानने के बाद भी उसे अभी तक
अमल में नहीं लाया गया है. जबकि इस बात को चार साल बीत चुके हैं.
ऑल इंडिया शहीद भगत सिंह ब्रिगेड
के अध्यक्ष एवं भगत सिंह के प्रपौत्र यादवेंद्र सिंह संधू सवाल पूछते हैं
कि सरकार की नजर में राज्यसभा की कार्यवाही का कोई मतलब है या नहीं? संधू
कहते हैं कि यदि 28 सितंबर तक सरकार इन क्रांतिकारियों को शहीद का दर्जा
नहीं देगी तो वह कोर्ट जाने को मजबूर होंगे.
उनका कहना है कि सरकार की इस लापरवाही की वजह से किताबों में भगत सिंह जैसे देशभक्त को भी ‘क्रांतिकारी
आतंकवादी’ लिखा जा रहा है. महान क्रांतिकारी भगत सिंह को अंग्रेजों ने 23
मार्च 1931 को लाहौर में फांसी दे दी थी. वह देश की आजादी के लिए ब्रिटिश
सरकार से लड़ रहे थे. लेकिन भारत की आजादी के 70 साल बाद भी सरकार उन्हें
दस्तावेजों में शहीद नहीं मानती. अलबत्ता जनता उन्हें शहीद-ए-आजम मानती
है.





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