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फांसी लगाकर बालिका ने की आत्महत्या, आर्थिक तंगी बना कारण महीने भर पहले भी कर चुकी थी आत्महत्या की कोशिश 

शिवपुरी। 6 साल पहले पिता की हत्या हो चुकी थी। घर में कमाने वाला कोई नहीं था। पूरा परिवार आर्थिक  तंगी से जूझ रहा था। इससे परेशान होकर 17 वर्षीय संवेदनशील बालिका ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। यह दर्दनाक हादसा फिजीकल थाना क्षेत्र के कमलागंज में मामू पान वाली गली में स्थित एक मकान में बीती रात घटित हुआ। महीने भर पहले भी उक्त बालिका आत्महत्या करने की कोशिश कर चुकी थी, लेकिन उसे भदैयाकुण्ड स्थित कुण्ड में पानी में डूबने से एक दंपत्ति ने बचा लिया था। 

फांसी लगाकर जान देने वाली उक्त बालिका का नाम अनामिका सिकरवार पुत्री सुनील सिकरवार है। उसके पिता चाट का ठेला लगाकर अपना तथा अपने परिवार का उदर पोषण करते थे। किसी तरह गृहस्थी की गाड़ी खिंच रही थी, लेकिन अगस्त 2011 में सुनील का पड़ोस में रहने वाले हिज्जै नामक व्यक्ति से विवाद हुआ और इस विवाद में सुनील की हत्या कर दी गई। हत्या के आरोप मे हिज्जै को उम्रकैद हो गई, लेकिन सुनील के परिवार की आर्थिक दशा पूरी तरह गड़बड़ा गई, क्योंकि अब घर में कमाने वाला कोई नहीं था। परिवार में अनामिका की मां, बहन अंबिका और एक भाई था। खर्चा चलाने के लिए अनामिका ने एक प्रायवेट स्कूूल में नौकरी की और भाई मुंबई चला गया। अनामिका को जो वेतन मिल रहा था वह इतना पर्याप्त नहीं था जिससे घर का खर्चा चल सके। इस स्थिति के कारण मृतिका काफी परेशान रहती थी। कल रात मां और दोनों बेटियां एक ही कमरे में सो रही थी। देर रात्रि जब मां जागी तो उसने देखा कि अनामिका कमरे में दुपट्टे का फंदा बनाकर झूल रही थी। 

जिस पर मृतिका की मां ने अपने ससुर गुलाब सिंह सिकरवार और देवर सूरज और अर्जुन को घटना की जानकारी दी। बाद में परिजन अनामिका को फांसी के फंदे से उतारकर टैक्सी से अस्पताल ले गए। जहां डॉक्टरों ने उसका परीक्षण कर मृत घोषित कर दिया। बाद में पुलिस भी अस्पताल पहुंच गई। जहां शव को पीएम हाउस भिजवा दिया और आज सुबह पीएम के बाद मृतिका के शव को परिजनों के सुपुर्द कर दिया। 

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भाई मुंबई में रहकर करता है नौकरी 

मृतिका के दादा गुलाबसिंह के अनुसार उसकी दो नातिन अनामिका व अंबिका हैं और एक नाती जो मुंबई में अपने मामा के साथ रेलवे स्टेशन पर कैंटीन पर काम करता है जहां वह कुछ पैसे परिवार के भरण पोषण के लिए पहुंचाता है, लेकिन इतने कम रूपयों में परिवार चलाना मुश्किल है। वह स्वयं गांव गांव पहुंचकर लोगों के इलाज कर कुछ रूपये कमाते हैं जिससे वह अपना खर्च निकालते हैं और उसमें से बचे हुए कुछ पैसे बहू को दे देते हैं। परिवार की ऐसी स्थिति के कारण ही अनामिका दुखी रहती थी। 

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