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मोदी के न्यू इंडिया विजन पर वित्त आयोग-राज्य सरकार में असहमति ! Bhopal News

  • Madhya Pradesh disagrees with the Finance Commission
  • आयोग ने कहा- विजन के लिए राज्यों का हिस्सा काटेंगे; नाथ बोले- यह गलत
  • कमलनाथ का तर्क : भारत सरकार अपने हिस्से से काम करे, राज्यों का हिस्सा काटने का क्या मतलब

भोपाल. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्यू इंडिया मिशन 2022 को लेकर 15वें वित्त आयोग और राज्य सरकार में असहमति सामने आई है। गुरुवार को मुख्यमंत्री कमलनाथ, मंत्रियों और अधिकारियों के साथ बैठे आयोग ने कहा कि न्यू इंडिया के लिए राज्यों के हिस्से में कटौती हो सकती है। इस पर मुख्यमंत्री नाथ ने आपत्ति करते हुए कहा कि भारत सरकार को अपने हिस्से से न्यू इंडिया मिशन का काम करना होगा। राज्यों का हिस्सा काटने का क्या मतलब है? क्या वे इसमें खर्च नहीं करेंगे। इस पर आयोग ने सकारात्मक रुख अपनाने की बात कही। 
आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह और चार सदस्यों के सामने मप्र ने अपनी आवश्यकताओं का प्रेजेंटेशन दिया। फाइनेंस पर अपर मुख्य सचिव अनुराग जैन, स्कूल ऊर्जा पर अपर मुख्य सचिव मोहम्मद सुलेमान, शिक्षा पर प्रमुख सचिव रश्मि अरुण शमी ने अपनी बात रखी। राइट टू वाॅटर और हेल्थ के बारे में चर्चा नहीं हो पाई। इससे पहले आयोग ने मुख्यमंत्री कमलनाथ और वित्तमंत्री तरुण भनोत से मुलाकात की।  
आयोग का तंज, 15 साल स्थाई सरकार रही, कृषि-आर्थिक विकास भी बढ़ा, फिर गरीबी क्यों है :
वित्त आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह व सदस्यों ने मप्र सरकार को कृषि और ऊर्जा के मामले में तीखा तंज कसा। सिंह ने कहा कि मध्यप्रदेश में पिछले पंद्रह वर्षों से स्थायी सरकार रही है। कृषि के साथ आर्थिक विकास बढ़ा, लेकिन इसका लाभ गरीबी पर नहीं दिखता। इतनी उपलब्धियों के बाद भी कुछ ऐसे विषय हैं, जो राज्य की स्थिति का ध्यान खींचते हैं। प्रति व्यक्ति आय में मप्र काफी पीछे है। देश की प्रति व्यक्ति आय 1 लाख 26 हजार है तो मप्र में यह 90 हजार 998 रुपए है। यह देश के कुछ पिछड़े राज्यों से भी कम है। ‘पॉवरटी रेशो’ के मामले में भी मध्यप्रदेश की स्थिति ठीक नजर नहीं आती है। देश में यह 21 प्रतिशत है तो मध्यप्रदेश में 33 प्रतिशत है। विकास के अन्य मापदंडों में भी मध्यप्रदेश काफी पीछे नजर आता है। 
इसी तरह एफआरबीएम के तहत राजकोषीय घाटा तीन से अधिक नहीं होना चाहिए। यह 3.2 फीसदी तक पहुंच गया, लेकिन इसमें कोई दिक्कत नहीं। बिजली के क्षेत्र में घाटा ज्यादा है। ट्रांसमिशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन लाॅस बढ़ गया। इसमें काम करने की जरूरत है। अजा-अजजा से जुड़ी योजनाओं में भी परिवर्तन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश ने आयोग के समक्ष जो भी अपेक्षाएं रखी हैं, आयोग प्रयास करेगा कि इसके अनुकूल कार्रवाई की जाए। 
जीएसटी परिषद के साथ संवाद करेंगे – सिंह :
प्रेस कांफ्रेंस में एक सवाल के जवाब में आयोग के अध्यक्ष सिंह ने आज कहा कि आयोग और जीएसटी कौंसिल के बीच नियमित संवाद की आवश्यकता है और इस संबंध में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से भी चर्चा हुई है। जीएसटी के रिफंड की प्रक्रिया में भी सुधार की जरुरत है।
1 अपनी योजनाओं में केंद्र सरकार अपना हिस्सा 60% से बढ़ाकर 70 व 90% करे
मप्र का तर्क : नीति आयोग की अनुशंसा के बाद भारत सरकार ने योजनाओं में केंद्र व राज्य के हिस्से के अनुपात को 60:40 कर दिया। पहले यह 90:10, 70:30 या 100 फीसदी तक था। तब केंद्र की ओर से कहा गया कि केंद्रीय करों में हिस्सेदारी 32 से 42 फीसदी की जा रही है, लेकिन अब यह भी कम पड़ रही है। इसके अलावा मप्र ज्यादा फाॅरेस्ट कवर वाला राज्य है। आदिवासी आबादी भी दूर-दूर फैली है। योजनाओं के क्रियान्वयन में खर्च ज्यादा होता है।
2 केंद्रीय करों का हिस्सा 50% हो, क्योंकि केंद्र सरकार 18.1% सेस ले रही है 
मप्र का तर्क : जब केंद्रीय करों का हिस्सा 32 से बढ़ाकर 42 फीसदी किया गया था, तब केंद्र सरकार अधिभार 12.7 फीसदी तक लेती थी। इससे पहले यह 2012-13 में 8.8 प्रतिशत था। 2013-14 में 9.2 प्रतिशत, 2014-15 में 9.3 और 2015-16 में 11.8 फीसदी था। अधिभार पूरा केंद्र सरकार रखती है। एेसे में केंद्रीय करों में से 18% निकल जाने के बाद बचे हुए 82 फीसदी में से मिलने वाला केंद्रीय करों का 42 फीसदी हिस्सा काफी कम होता है।
3 फाॅरेस्ट को ध्यान में रखते हुए प्राथमिकता दी जाए  
मप्र का तर्क : मप्र में दूसरे कई राज्यों की तुलना में फाॅरेस्ट ज्यादा है। सड़क बनानी हो, बांध बनाने हों या कोई दूसरी विकास योजना को संचालन हो, पैसा ज्यादा खर्च होता है। प्रोजेक्ट काॅस्ट भी बढ़ती है। हम फाॅरेस्ट का भार लेकर और उसे संभालते हुए आगे बढ़ रहे हैं, इसलिए केंद्र से मिलने वाली राशि में मप्र का वेटेज 7.5 फीसदी से बढ़ाकर 10 फीसदी किया जाए। 
4 बाजार से कर्ज लेने की सीमा 3 से 4 फीसदी करें
मप्र का तर्क : वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव अनुराग जैन ने इसके पक्ष में कहा कि राज्य में वित्तीय अनुशासन है। रेवेन्यू सरप्लस है। सालाना देनदारी भी 25% से ज्यादा नहीं है। बाजार से लिए जाने वाले कर्ज का ब्याज 10 फीसदी से कम है। इस पर आयोग के अध्यक्ष सिंह ने कहा कि आप पहले से ही तय सीमा 3 से 0.2 फीसदी ज्यादा कर्ज ले चुके हैं। इसमें दिक्कत नहीं है।
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