अजेय राज सक्सेना शिवपुरी: मध्यप्रदेश की राजनीति में आए इस भूचाल को जन्म भी भाजपा ने दिया अब खत्म भी भाजपा से ही होगा? , मध्यप्रदेश की जनता अभी अपने पत्ते खोलने के मूड में नही दिख रही है. जनता अपना मूड तो बना चुकी है लेकिन पत्ते अभी सामने आने में समय बाकी है शिवराज सिंह रोज़ नई योजनाओं की घोषणाओं पर घोषणा करते नजर आ रहे हैं लेकिन क्या जनता पर इन योजनाओं का असर दिख रहा है ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन एक बात तो सच है कि कही न कही एंटी इनकंबेंसी का माहौल तो बना हुआ है अब शिवराज और महाराज इस माहौल को कितना परिवर्तित कर पाते हैं यह तो वक्त बताएगा लेकिन आज के वक्त में शिवराज तो अपना काम कर रहे हैं लेकिन महाराज के साथ आए लोग अब महाराज का साथ छोड़ते नजर आ रहे हैं कहीं ना कहीं इस पूरे मामले में महाराज अपने समर्थकों के वादों पर खरे उतरते नहीं नजर आ रहे हैं और कुछ समर्थकों ने उम्मीदों की दुकान कुछ बड़ी बना ली है जिसके कारण भी समस्या बन रही है बात करें राजनीतिक गलियारों की तो चर्चा बड़ी खरी खरी है कि माहौल तो बड़ा गरम है लेकिन तड़के की जरूरत अभी भी है अगर बात करें तो पिछले कुछ समय से लगातार सिंधिया समर्थकों का कांग्रेस में वापसी चले जाना सिंधिया के लिए सिर का दर्द बनता नजर आ रहा है या तो यह समर्थक जो आज जा रहे हैं जो सिंधिया के साथ भाजपा में आते ही नहीं और आ गए थे तो इनको कांग्रेस में नहीं जाना चाहिए था यह सोच कहीं ना कहीं सिंधिया के दिमाग में घर कर रही है अब बात करें मध्य प्रदेश की राजनीति की तो सिंधिया का ग्राफ जितनी तेजी से बढ़ा है कहीं ग्राफ उतनी ही तेजी से नीचे ना जाए इस बात का ध्यान सिंधिया को रखना पड़ेगा.
बात करें राजनीतिक गलियारों की तो सिंधिया की अगर बात करें तो सिंधिया के लिए आम चुनाव 2023 बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि 2020 सरकार तो शिवराज ने बनाई थी लेकिन वह सरकार सिंधिया की कहलाई गई और बात में भी दम है क्योंकि सिंधिया के समर्थकों में से 12 लोगों को मंत्री पद से नवाजा गया लेकिन अब सिंधिया को अपने वजूद का खतरा नजर आ रहा है क्योंकि अगर कहीं 2023 के आम चुनाव में सरकार पलट गई और सरकार कांग्रेस की आ गई तो कहीं ना कहीं सिंधिया के ग्राफ में भारी गिरावट नजर आएगी
कांग्रेस और भाजपा में अंतर
देखिए मैं आपको बताना चाहूंगा कांग्रेस और भाजपा में जमीन आसमान का अंतर है जहां तक सिंधिया के कांग्रेस में रहने की बात है तो जब तक सिंधिया कांग्रेस में रहे तो ग्वालियर चंबल अंचल में कांग्रेसी यानी सिंधिया के नाम से जानी जाती थी और जिस पर से सिंधिया हाथ रख दे देते उसको वहीं से टिकट दे दिया जाता था लेकिन भाजपा की कार्यशैली बिल्कुल उलट है भाजपा में टिकट किसी व्यक्ति के नाम पर नहीं दिए जाते भाजपा पार्टी अपने सिद्धांतों पर चलती है और भाजपा में कई बड़े नेता ग्वालियर चंबल अंचल में अपना वजूद रखते हैं पूर्वजों को भी ध्यान में रखना पड़ता है अब ग्वालियर चंबल यानी भाजपा नहीं है भाजपा में जिसका नाम सर्वे में आएगा उसको टिकट दिया जाएगा यह कहते हुए खुद सिंधिया भी अब नजर आ रहे हैं यहीं से शुरू होता है सिंधिया के संघर्ष का समय क्योंकि अब टिकट नाम पर नहीं काम पर मिलेंगे और कई सिंधिया समर्थकों के टिकट कट भी सकते हैं इसीलिए अब सिंधिया भी काम की बात करते नजर आ रहे हैं अब ग्वालियर चंबल का भार ही नहीं बल्कि पूरे मध्यप्रदेश का भार सिंधिया के कंधों पर है और जीत पर प्रमोशन और हार पर डिमोशन का डर सिंधिया को सता रहा है.
सबसे बड़ी समस्या सिंधिया को अपने साथ आए कांग्रेसियों को भाजपा में स्थान दिलाने में और अब साथ में लेकर चलने में बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि यह भाजपा है ना कि कांग्रेस अभी पिछले कुछ समय नहीं उनके शिवपुरी जिले के दो मुख्य समर्थकों ने भाजपा छोड़ कांग्रेस को ज्वाइन कर लिया जिसमें पहला नाम बैजनाथ सिंह यादव जो की कोलारस विधानसभा से एक बड़ा नाम है वही दूसरा नाम राकेश कमल दास गुप्ता जो कि शिवपुरी विधानसभा से एक बड़ा नाम है दोनों को कट्टर सिंधिया समर्थकों में गिना जाता था लेकिन कहते हैं ना वक्त जब अपना रंग दिखाता है तो समय कब बदल जाता है पता ही नहीं लगता यही कहावत यहां पर चरितार्थ होती नजर आ रही है अब देखने वाली बात तो विधानसभा चुनाव 2023 पर निर्भर करते हैं क्या सिंधिया को मिलेगा प्रमोशन या होगा उनका डिमोशन?

राजनीतिक गलियारे: क्या फिर दम दिखा पाएगी महाराज और शिवराज की जोड़ी या जनता करेगी कमलनाथ के नाथ को स्वीकार? / POLITICAL NEWS
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