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बच्चों को गेम की लत से निकालने पैरेंट्स को बदलना होगी आदत

इंदौर, ! शहर में हाल ही में 12
वर्षीय एक छात्र ने महज इसलिए आत्महत्या का प्रयास किया क्योंकि यह मोबाइल
पर खेले जाने वाले गेम का टॉस्क था। जिसमें मनोरंजन की कीमत बच्चे को ऊंची
इमारत से कूदकर अपनी जान गंवाने से चुकानी थी। 49 टॉस्क को पार करने के बाद
जीवन खत्म कर लेने का यह निर्णय केवल शहर के इस विद्यार्थी ने ही नहीं
लिया है बल्कि दुनिया में कई बच्चे इस तरह से जीवन समाप्त कर चुके हैं या
कोशिश कर चुके हैं।
पहले पोकेमॉन और अब ब्लू व्हेल जैसे गेम बच्चों
की जान के दुश्मन बनते जा रहे हैं। जिसके लिए जिम्मेदार केवल गेम्स ही नहीं
बल्कि वह अनदेखी भी है जो बच्चों के साथ अभिभावकों की रहती है और वह लत भी
है जो मनोरंजन के लिए बच्चों पर हावी हो जाती है।
तकनीक के इस दौर
में बच्चों को गैजेट्स से दूर तो नहीं रखा जा सकता लेकिन इस बात का भी
ध्यान रखना जरूरी है कि तकनीक रिश्तों से ‘रिप्लेस’ नहीं हो सकती। तकनीक के
उपयोग में तर्क पर ध्यान देना भी जरूरी है और यह बात बच्चों के साथ
अभिभावकों को भी समझना होगी। अमूमन देखने में आता है कि पैरेंट्स अपनी
सुविधा के लिए बच्चों को गैजैट्स दे देते हैं और अपना काम खत्म होने पर
वापस ले लेते हैं। पर यही आदत बच्चों में गैजैट्स की लत लगाती हैं।
डिसीप्लीन बट विथ लव के कंसेप्ट पर भी दें ध्यान
पैरेंटिंग
एक्सपर्ट अभिषेक पसारी के अनुसार बच्चे को जीवन के पहले 6 साल में प्यार
की जरूरत होती है जो कि मां के प्यार से भी पूरी हो सकती है। दूसरे 6 सालों
में प्यार और अनुशासन की जरूरत होती है। यह जिम्मेदारी माता-पिता दोनों को
साथ में निभाना चाहिए। तीसरे 6 सालों में ‘डिसीप्लीन बट विथ लव” के
कंसेप्ट को अपनाते हुए बच्चे की परवरिश करना चाहिए। इसमें माता-पिता को
पीछे हटते हुए अपने स्थान पर एक ऐसे मैच्युअर मेंटर बच्चे के साथ रखना होता
है जो उसे सही-गलत समझा सके। क्योंकि इस उम्र में बच्चा माता-पिता से नहीं
बल्कि दोस्त से बातें साझा करता है। ऐसे में मैंटर को दोस्त की भूमिका
निभानी होती है।
बच्चों की पसंद के विषय पर करें चर्चा
यह
पैरेंट्स के लिए भी चिंता का विषय है कि वह बच्चे के उन भावों को नहीं समझ
सके जो इस तरह के खेल के कारण बच्चे के शारीरिक और मानसिक बर्ताव पर
नकारात्मक प्रभाव डाल रहे थे। पैरेंटिंग एक्सपर्ट डॉ. अमित बंग कहते हैं कि
इन गेम्स या साइड्स से आप बच्चे को दूर नहीं रख सकते लेकिन उन पर अनुशासित
और तार्किक तरीके से अंकुश जरूर लगा सकते हैं।
अकेला महसूस न होने दें बच्चों को
इस
तरह के गेम अधिकांशत: वे बच्चे खेलते हैं जो किन्हीं कारणों से खुद को
अकेला महसूस करते हैं या किसी कारण से निराश हैं। ऐसे मामले एक-दूसरे को
देखकर और भी बढ़ जाते हैं इसलिए अब बच्चों के लिए ज्यादा सतर्क होने की
जरूरत है। मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. पवन राठी के अनुसार हानिकारक गेम्स खेलने के
दौरान बच्चों के बर्ताव में नकारात्मक परिवर्तन आता है उस पर गौर करें।
इसके लिए उनके दोस्त और टीचर्स से मुलाकात करें। पैरेंट्स बच्चों के मन से
अपने लिए डर निकालें और उन्हें जीवन के उतार-चढ़ाव से रूबरू कराएं। बच्चों
के शरीर पर ध्यान दें कि कहीं उन्होंने खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश तो
नहीं की।
फ्रेंडलिस्ट में हो आप भी शामिल
इस
तरह के गेम या ऐसे शो जो कि आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं उन पर भी
धारा 306 लगती है। जहां तक बात मोबाइल या सोशल साइड्स पर इस तरह के गेम या
साइबर क्राइम की है तो इसके लिए अभिभावकों को भी तकनीकी रूप से जागरूक
होना होगा। सोशल साइड्स आदि पर बच्चे की फ्रेंड लिस्ट में पैरेंट्स का
शामिल होना जरूरी है ताकि वे उनकी गतिविधियों पर नजर रख सकें। – वरूण कपूर,
एडीजी नार्कोटेक्स, सायबर क्राइम एक्सपर्ट
तकनीक से रखें तकनीक पर नजर

गूगल प्ले स्टोर पर जाएं। वहां सेटिंग ऑप्शन में जाकर माय एप्स एंड गेम्स
को ओपन करें। इसमें लाइब्रेरी, अपडेट्स और इन्स्टॉल्ड में जाकर ये देखें कि
क्या इंस्टॉल और क्या अनस्टॉल हुआ है।
– बच्चे के मोबाइल में भी
पैरेंट्स अपना ही मेल आईडी और पासवर्ड दें ताकि बच्चा जब भी कोई गेम, एप
आदि इंस्टॉल करे तो या तो वह आपसे पासवर्ड मांगेगा या फिर उसकी जानकारी
आपके मेल आईडी में आ जाएगी।
– स्क्रीन रिकॉर्डर सॉफ्टवेयर भी अपलोड
कर सकते हैं। इससे लाभ यह होगा कि जो भी वर्क उस मोबाइल पर किया है वह आप
भी देख सकेंगे। यह सुविधा कुछ ही समय के लिए उपयोगी होती है पर इसका उपयोग
आप समय-समय पर कर सकते हैं।
– बी स्मार्ट एप या एप लॉक जैसी एप्लीकेशन्स को डाउनलोड करके कई गेम्स, एप्लीकेशन आदि को काफी हद तक डाउनलोड होने से रोक सकते हैं।
राकेश उपाध्याय, आईटी एक्सपर्ट
इन पर करें गौर
– बच्चों को उत्साहित करने के लिए खुद भी फिजिकल एक्टिविटी करें।
– बच्चे के साथ सभी मुद्दों पर चर्चा हो।
– माता-पिता बच्चे के साथ साथ में वक्त बिताएं।
– बच्चे की पसंद, संगत और कार्यों का पैरेंट्स को पता हो।
– बच्चों को जिंदगी की हकीकत बताएं।
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