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पोहरी कृषि उपज मंडी में व्यापारी व अधिकारियो की मनमानी चरम पर

योगेन्द्र जैन /देवी सिंह जादोंन पोहरी:- कृषि उपज मंडी पोहरी में व्यापारियों और कर्मचारियो की मनमानी चरम पर है किसानों की फसल के दाम तक नही लगाए जा रहे है।
अभी हाल ही में कल शाम को किसानों द्वारा मंडी में खूब हंगामा किया जिसको बड़ी मुश्किल से शांत किया गया जिसके बाद भी मंडी सचिब अपनी मनमानी पर उतारू हो गए है।
ऐसे में किसानों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
जहा हंगामे के बाद किसानों की हालत सुधरने की बजह किसानों को इधर उधर भटकना पड़ रहा है।
मंडी की अव्यस्थाओ को लेकर एक ओर किसान में आक्रोश है

जानवरो की टँकी का दूषित पानी पी रहे किसान -पोहरी कृषि उपज मंडी में अब्यबस्था चरम पर है। जहा लगातार अन्नदाताओ को परेशान किया जा रहा है। मंडी में किसानों को पीने के लिए पानी की कोई उचित सुविधा भी  नही है बही मंडी में एक कई सालों पुरानी टंकी बनी हुई है जिसका पानी जानवरो के पीने का है पर मजबूर होकर किसान पी रहे है शासन द्वारा लगातार किसानों को कई सुबिधा मुहैया कराई जा रही है लेकिन मंडी में बैठे अधीनस्थ कर्मचारी मिलकर बंदरबांट करने में लगे हुए है

*कर्मचारी लगा रहे शासन को चपत,बिना टैक्स के निकल रहे बाहन* -पोहरी तहसील की कृषि उपज मंडी के हालात खराब होते नजर आ रहे है। ऐसे में व्यापारी ओर मंडी कर्मचारी की मिलीभगत से लगातार शासन को मिलने बाले टेक्स में चपत लगाई जा रही है।
बिना गेट पास के रातो-रात बाहन निकाले जा रहे है। जिससे शासन को टैक्स के रूप में मिलने बाला पैसा सीधा मंडी कर्मचारियो की जेब मे जा रहा है।
ऐसे में मंडी की जगह गोदामो पर जगह-जगह माल तोला जा रहा है जिससे टेक्स चोरी करने में आसानी होती है।

*24 घण्टे की जगह महीनों तक रखा रहता है व्यापारियों का माल* -पोहरी कृषि उपज मंडी में ट्रॉली सेट तैयार किये गए है जिनमे किसानों से खरीद कर 24 घण्टे तक व्यापारियों का माल रखा जाता है लेकिन सांठगांठ से महीनों तक व्यापारियों द्वारा टेनसेट पर कब्जा जमाया हुआ है जिस पर मंडी प्रसाशन द्वारा कन्नी काट ली गई है।
इनका कहना है
हमारे द्वारा किसानों को सुबिधा मुहैया कराई जा रही है। मंडी में स्टाफ की कमी से कुछ कार्य में रुकावट आ जाती है।
आर. पी.सिंह मंडी सचिब पोहरी

मंडी में फसल बेचने आते है मजबूरी में इसी टंकी का पानी पीना पडता है।
दिलीप गवालीपुरा कृषक

न तो पीने का पानी मिल रहा और न ही केन्टीन का पता है। मजबूरी में इसी टँकी का पानी पीना पड़ रहा है।
रामू गलथुनी कृषक

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