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संसार में रहकर जीवन मुक्त जीने की कला सिखाती है भागवत: मां कनकेश्वरी देवी

खनियांधाना। पदार्थ से जो सुख मिला है वह वास्तविक सुख नहीं है परमात्मा का सत्य स्वरुप समझना, उस का ज्ञान होना ही वास्तविक सुख है इसीलिये व्यास जी ने अपने पुत्र शुकदेव को राजा जनक के पास भेजा कि उनसे सीख कर आओ कि संसार में रहकर भी बंधन में रहकर भी मुक्त कैसे रहा जा सकता है क्योंकि यह जीवन जीने की कला जिसको आ गई समझ लो उसका कल्याण निश्चित है यह भाव खनियाधाना के चंद्रशेखर आजाद सभागार मैदान में चल रही नौ दिवसीय श्रीमद देवी भागवत कथा में कथावाचक राष्ट्रसंत मां कनकेश्वरी देवी ने व्यक्त किए। कथा को सुनने के लिए हजारों की संख्या में भक्त गण महिला एवं पुरुष उपस्थित थे तथा कथा के बीच -बीच में उनके द्वारा गाये जा रहे भजनों पर लोग संगीत की धुनों पर झूम रहे थे । कथा के मुख्य यजमान क्षेत्रीय विधायक श्री के पी सिंह कक्काजू खुद पूरे समय उपस्थित रहकर कथा का श्रवण कर रहे हैं । 

श्रीमद् भागवत कथा का वाचन करते हुए  मां कनकेश्वरी देवी ने कहा कि भगवान विष्णु जी के आराम करते समय उनके कान से दो राक्षस प्रकट हुए जिन्होंने भगवान से स्वयं की इच्छा से मृत्यु वरदान मांगा आगे चलकर इन राक्षसों से भगवान विष्णु जी का युद्ध हुआ जिसमें दोनों राक्षसों को हराना मुश्किल हुआ तो भगवान ने थोड़ी देर विश्राम करने को दोनों राक्षसों से कहा, विश्राम करते समय ही भगवान विष्णु ने देवी दुर्गा की आराधना की तब देवी जी ने बाल अवतार लिया और देवी ने मार्ग वताया तब विष्णु भगवान ने मधु और केटप से कहा कि मागों क्या वर चाहिये मगर तब तक तो दोनों राक्षसों के अंदर अहंकार आ गया था दोनों बोले तुम कौन होते हो वर देने बाले हम क्या याचक है हम तो दाता है मागों तुम क्या मागते हो तो विष्णु जी ने तुरंत कहा कि मेरे हाथों से मरो फिर मधु, केटप का अंत हुआ।

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