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तीर्थंकर अवतार नहीं होते, प्रत्येक व्यक्ति बन सकता है भगवान : साध्वी आभाश्रीजी  पोषद भवन और पाश्र्वनाथ मंदिर में मनाया गया भगवान पाश्र्वनाथ का जन्मकल्याणक

शिवपुरी। तीर्थंकर अवतार नहीं होते वह भी हमारी तरह इंसान होते हैं, लेकिन सदकर्म तथा शुद्ध भावना रखकर वह तीर्थंकर पद को प्राप्त करते हैं। उक्त उदगार पोषद भवन में प्रसिद्ध जैन साध्वी आभाश्रीजी महाराज ने भगवान पाश्र्वनाथ के जन्मकल्याणक के अवसर पर आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भगवान का जन्मकल्याणक इसलिए मनाया जाता है, क्योंकि वह न केवल स्वयं तिरते हैं बल्कि दूसरों को भी तिराते हैं। प्रारंभ में पोषद भवन में प्रसिद्ध समाजसेवी स्व. वीरचंद्र कोचेटा की पुण्यतिथि के अवसर पर नवकार महामंत्र के पाठ का आयोजन रखा गया तथा धर्मसभा के बाद भगवान पाश्र्वनाथ जन्मकल्याणक के अवसर पर पाश्र्वनाथ श्वेताम्बर जैन मंदिर में सांखला परिवार की ओर से पूजन का आयोजन किया  गया। जिसमें भक्तिभाव पूर्वक भगवान  का जन्मकल्याणक मनाया गया और  इस  अवसर पर जय दुर्गे टॉकीज के सामने  भण्डारा वितरित  किया गया। 

साध्वी आभाश्रीजी ने अपने प्रेरक उदबोधन में बताया कि इंसान अभाव के कारण दुखी नहीं होता बल्कि अपने भावों के कारण दुखी होता है। इसे स्पष्ट करते हुए साध्वीजी ने कहा कि समभाव की स्थिति हम तब प्राप्त कर सकते हैं जब प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थिति भी हमें विचलित नहीं कर पाए, लेकिन होता यह है कि बड़ा भाई छोटे भाई के व्यवहार के कारण, सास बहू के कारण और जेठानी देवरानी के व्यवहार के कारण दुखी हो जाती है। यह दुख इसलिए पैदा होता है, क्योंकि हमने अपेक्षाएं पाल रखी हैं। उन्होंने कहा कि यदि हमने हर स्थिति में समभाव धारण कर लिया  तो हमें दुखी नहीं किया जा सकता। बकौल साध्वी जी, समभाव की यात्रा तीर्थंकर बनने की यात्रा है। उन्होंनेे कहा यह कहना गलत है कि पंचम काल में तीर्थंकर नहीं बना जा  सकता। इस काल में भी तीर्थंकर गोत्र का बंध किया जा सकता है। साध्वीजी ने जीवन को राग और द्वेष से मुक्त करने का संदेश दिया और कहा कि यदि राग से मुक्ति न मिल पाए तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन जीवन को ईश्वर पथ  पर अग्रसर करने के लिए द्वेष  से मुक्ति अत्यंत आवश्यक है। किसी के प्रति प्रेम अंतत: समस्त प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव का कारण बन जाता  है। धर्मसभा के अंत में साध्वी विभाश्रीजी ने श्रद्धालुओं को मांगलिक पाठ का श्रवण कराया। 

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अनंत गुण धारक हैं परमात्मा

धर्मसभा में साध्वी आभाश्रीजी ने श्रद्धालुओं से पूछा कि भगवान में कितने गुण होते हैं इस पर सबने अपने-अपने नजरिये से उत्तर दिया। किसी ने कहा 36 गुणधारक, किसी ने कहा 108 गुणधारक तो कोई बोला भगवान में 1008 गुण होते हैं। इस पर साध्वीजी ने कहा कि भगवान के गुणों को संख्या में कैद नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह अनंत गुण धारक हैं। उन्होंने कहा कि जिस  तरह से आकाश को अपनी मु_ी में कैद नहीं किया जा सकता। उसी तरह से भगवान के गुणों को सीमित नहीं रखा जा सकता। 

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