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माताऐं अपने बच्चों को बचपन से ही संस्कार दें ताकि दुर्योधन जैसी संतान नहीं निकले

खनियांधाना। धृतराष्ट्र के विवाह के पश्चात गांधारी ने पतिव्रत के पालन हेतु अपनी आँखो पर पट्टी बांध ली जिसके कारण दुर्योधन जैसे पुत्रों को संस्कार नही मिल सके। आज के युग मे भी माताएं अपने पुत्रो के गलत कार्यो को अनदेखा करती हैं जिससे संतान दुर्योधन जैसे असंस्कारी सिद्ध होते है। यह प्रवचन करते हुए राष्ट्रसंत माँ कनकेश्वरी देवी ने खनियांधाना के चंद्रशेखर आजाद सभागार मैदान में चल रही श्रीमद देवी भागवत कथा में व्यक्त किये । क्षेत्रीय विधायक के. पी. सिंह कक्का जू द्वारा प्रदेश में पहली बार आयोजित हो रही श्रीमद देवी भागवत कथा के तीसरे दिन आज बड़ी संख्या में भक्तगण कथा सुनने पहुंचे जिसमें आज बताया कि सर्व शक्तिमान सत्ता जो अदृश्य रूप से कारण के कारण कर्ताओं को उत्पन्न करतीं है उसने ही बेदो को कर्ता बनाया । बेद और शास्त्र के अनुसार मनुष्य को  जीने का ज्ञान दिया प्रकृति के साथ यदि हम चलते है  तो हमारा उत्थान और बिकास होता है यदि प्रकृति के बिपरीत चलने पर विनाश की ओर जाते है । गुरुकी महत्वता पर प्रकाश डाला और बताया कि गुरु अपने शिष्य की तीन परीक्षाएं करवा कर पात्र शिष्य का चयन करते है जिसका उदाहरण उन्होंने शुकदेव जी अपने पिता वेद व्यास के कहने से ज्ञान प्राप्त करने के लिये जनक जी के पास गये तब उन्होने तीन परीक्षाएं गुरु के रूप मे ली  संयम, तृतीक्षा और जिज्ञासा । उन्होनें बताया कि जीवन मुक्त होने के दो मार्ग है पिपिलिका (चिंटी वाला)जो साधना और श्रम और विश्वास के साथ बढते जाना ,और दूसरा विहिंगम जो पक्षियों की तरह उडके जाना इस मार्ग मे इच्छाएं कभी भी बलवती हो जाती हैं तब मनुष्य लौट के  वहीं आ जाता है देवी भागवत कथा व्यास जी ने स्वयं वक्ता बनकर पारीक्षत के पुत्र जन्मेजय के निवेदन पर अपने पिता पारीक्षत के मोक्ष के लिये सुनाई । आज की कथा मे अष्ट वशुओं के उत्पन्न होने का वृत्तांत और सात वशुओं की मुक्ती के बाद अष्टमे वशु भीष्मपिता के बारे मे संपूर्ण जानकारी दी। कथा के अंत में के. पी. सिंह ने आरती की।

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