झाबुआ। हाथी-घोड़ा पालकी… जय कन्हैया लाल की… नंद के घर आनंद भयो… जैसे स्वर लहरियों के बीच बुधवार को भागवत कथा के चौथे दिन श्रीकृष्ण जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया। श्रीकृष्ण बने बालक को नंदबाबा टोकरी में लेकर जैसे ही श्रद्घालुओं के बीच से गुजरे तो सभी ने पुष्पवर्षा से श्रीकृष्ण व नंदबाबा का स्वागत किया। श्रीकृष्ण के भजनों पर महिलाएं जमकर थिरकी।श्रीमद भागवत कथा के चौथे दिन भागवत कथा को सुनाते हुए आचार्य रामानुज ने कहा कि चमड़े के तबले को यदि समय-समय पर छुआ न जाए तो पड़ा-पड़ा वह बेकार हो जाता है। उसे उतारे बगैर उसमें से ध्वनि नहीं निकलती है। इसी तरह जीवन के बोथरेपन को भी प्रभु नाम स्मरण से उतारना पड़ता है। इसका मुख्य ध्येय ही ईश्वर की प्राप्ति होता है। बहुत ही साधनाओं तथा सत्कर्मो के कारण ही हमें मानव जीवन प्राप्त हुआ है। अतः जब तक परमात्मा का अनुभव नहीं हो हमें सतत परमात्मा की आराधना व सत्संग का लाभ उठाना ही चाहिए। परमात्मा के अनुभव के बगैर यह जीवन अधूरा है, यह जीवन परमात्मा क ही दिया हुआ है तो कभी भी निरर्थक नहीं हो सकता है। ईश्वर की प्रतिमा में साक्षात परमात्मा का स्वरूप देखना चाहिए। भगवान वह है जिसको आप कभी याद करना भूल सकते हो, लेकिन भगवान तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ने वाला है। हम जीवन भर मिट्टी के घड़ों को फाड़ते रहे, किंतु हमारी खोपड़ी में भरे अहंकार व वासनाओं को कभी भी फोड़ने की कोशिश नहीं की। भागवत स्वयं शाश्वत भगवान की पूजा है और उसका दिव्य स्वरूप है। जब व्यक्ति पाप मार्ग पर निकले तो उसकी अंतर आत्मा साथ देना बंद कर देती है। मन जब बुद्धि का दास हो जाए तो संकल्प की शक्ति समाप्त हो जाती है। लालच में जीने की बजाय परमात्मा की चाहत में जीना सीखो। दूसरों के अधिकारों के हनन से साक्षसी आनंद जरूर मिल सकता है, किंतु आत्मीय शांति बिदा हो जाती है।
भागवत कथा श्रवण से जन्म-जन्मांतर के नष्ट होते हैं विकार
आचार्य ने कहा कि प्रभु की कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है। भगवान का जन्म होने के बाद वासुदेव ने पानी से भरी जमुना पार कर उन्हें गोकुल में यशोदा मां और नंद के पास पहुंचा दिया। सत्संग में आने का अवसर सभी को नहीं मिलता। भागवत कथा सुनने से दुख-विषाद से प्रसाद बन जाता है, जबकि सुख पाकर व्यक्ति अभिमानी बन जाता है। दुख मिलने पर भगवान के प्रति आस्था बढ़ती है। श्रीमद् भागवत कथा कल्पवृक्ष है, इसे सुनने मात्र से मानव का कल्याण होता है। कथा श्रवण से जन्म-जन्मांतर के विकार नष्ट होते हैं। प्राणी का लौकिक व अध्यात्मिक विकास होता है। व्यक्ति भव सागर से पार हो जाता है।
असत्य पर सत्य की जीत
विद्वान वक्ता ने कहा कि द्वापर युग में अधर्म बढ़ने के साथ पाप व अत्याचार जब बढ़ने लगे तब श्री हरि ने मथुरा में आकर अपना प्राकट्य किया। देवता और दानवों का संग्राम हुआ। इसमें देवताओं की जीत हुई। मानव को समझना चाहिए कि सत्य की हमेशा जीत और असत्य की हार होती है। व्यक्ति को हमेशा भगवान का भजन करते रहना चाहिए। जब भी दुख-विपदा आती है तो परमात्मा का सुमिरन करने से कितना भी कठिन मार्ग हो सरल बन जाता है। रामावतार के बारे में भी आचार्य ने विस्तार से बताया। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर नंद यशोदा के रूप में प्रमोद सोनी व अंजू सोनी तथा वासुदेव के रूप में रविराज राठौर थे। इस जीवंत झांकी को कुंता सोनी तथा अंचला सोनी के नेतृत्व में प्रस्तुत किया गया।





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