भोपाल, बच्चे ने बेसिक लाइफ सपोर्ट (बीएलएस) तकनीक से सीने को दबाकर खिलाड़ी की सांसे वापस ला दी। ऐसे ही पिछले हफ्ते जबलपुर में एक फिजियोथैरेपिस्ट ने 60 साल के बुजुर्ग की जिंदगी बचाई। बुजुर्ग रात में सड़क किनारे पड़ा था। सांस नहीं चल रही थी। फिजियोथैरेपिस्ट ने बीएलएस देकर बुजुर्ग को बचाया।

मेडिकल यूनिवर्सिटी प्रदेश के हर घर में इसी तरह से जिंदगी बचाने वाले ‘जीवन रक्षक” तैयार कर रही है। मेडिकल यूनिवर्सिटी के कुलपति व कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. आरएस शर्मा ने बताया कि हार्ट अटैक के तीन मिनट के भीतर मरीज को बेसिक लाइफ सपोर्ट दिया जाए तो 90 फीसदी मरीजों को बचाया जा सकता है। तीन मिनट तक ब्रेन को ऑक्सीजन नहीं मिलती तो ब्रेन डेड हो जाता है। फिर हार्ट काम भी करने लगे तो कोई फायदा नहीं। लिहाजा यूनिवर्सिटी बेसिक लाइफ सपोर्ट की ट्रेनिंग देकर घर-घर में जीवन रक्षक तैयार कर रही है। इसकी शुरुआत जबलपुर से हुई दो महीने पहले हुई है। सघन डेथ प्रिवेंशन डे (4 दिसंबर) से प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों को इस तरह की ट्रेनिंग शुरू करने के लिए कहा गया है। डॉ. शर्मा ने बताया कि अब तक छह हजार लोगों को ट्रेंड किया जा चुका है। भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज में भी इसकी शुरुआत हो चुकी है।
इन्हें दी जा रही ट्रेनिंग
जबलपुर में मेडिकल कॉलेज के एनेस्थीसिया विभाग को इसके लिए नोडल बनाया गया है। दो निजी अस्पताल व इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भी इसमें सहयोग कर रहे हैं। यह स्कूल-कॉलेज में छात्रों को पुलिस कर्मियों व चिकित्सकीय स्टाफ को एक दिन की ट्रेनिंग दे रहे हैं। इन्हीं में से मास्टर ट्रेनर तैयार किए जा रहे हैं जो यह शपथ लेते हैं कि सौ अन्य लोगों को बीएलएस में ट्रेंड करेंगे।
हार्ट अटैक के मरीजों को बचाने के लिए यह करना होता है
सबसे पहले गर्दन को सीधा कर किसी भी तरफ घुमा दें। कान लगागर सुनें कि सांस चलने की आवाज आ रही है या नहीं। इसके बाद देखना चाहिए नाड़ी चल रही है या नहीं। सांस व नाड़ी नहीं चल रही तो बायां हाथ नीचे और दाहिना हाथ ऊपर रखकर मरीज के सीने के निचले हिस्से को 5 सेमी तक दबाना चाहिए। ऐसा एक मिनट में 120 बार करना है। 30 बार सीना दबाने के बाद एक बार मुंह से मरीज के मुंह में सांस फूकना जरूरी है।
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