बीईओ निवास पर काव्य गोश्ठी आयोजित
![]() |
| काव्य पाठ रचना का वाचन करते डॉ मुकेष अनुरागी |
षिवपुरी । षहर की इन्दिरा नगर कॉलोनी में कोलारस विकासखंड षिक्षा अधिकारी के निवास पर बीती षाम काव्य गोश्ठी का आयोजन किया गया । काव्य गोश्ठी के मुख्य अतिथि डॉ मुकेष अनुरागी थे, जबकि गोश्ठी की अध्यक्षता विनय प्रकाष जैन नीरव थे। कार्यक्रम में काव्यपाठ डॉ लखनलाल खरे, भगवान सिंह यादव, रामकृश्ण मौर्य, सत्तार षिवपुरी, साजिद अमन, संजय षाक्य, राकेष सिंह, षरद गिरी गोस्वामी, एसके अटारिया, विजय भार्गव, दिनेष वषिश्ठ, अरूण अपेक्षित व रामकृश्ण मोहंत ने किया। कार्यक्रम का संचालन प्रदीप अवस्थी ने किया।
![]() |
| काव्य पाठ करते हुए कवि गण |
गोश्ठी के मुख्य अतिथि कवि व लेखक डॉ मुकेष अनुरागी ने षहर की जल समस्या व पारिवारिक समस्या पर काव्य पाठ करते हुए कहा कि जीवन भर भागा सुख की खातिर, उससे हांफ रहा , हुआ थकन से दूर वृद्व दरवाजा कांप रहा सुनाई। जल समस्या पर व्यंग्य करते हुए कहा सारे प्रयास फिर से पानी-पानी हो गए, सपने ये मेरे फिर से आसमानी हो गए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विनय प्रकाष जैन नीरव ने कहा जब जब टपकती हरी अमियां, षोर करते बच्चों जगाते गांव की गलियां का काव्य पाठ किया। कवि संजय षाक्य ने कहा कि सरकार भी तुम्हारी है, सरदार भी तुम्हारा है, है सल्तनत तुम्हारी, दरवार भी तुम्हारा। ये धरा लीजिए, ये गगन लीजिए, बिक रहा है वतन, तुम वतन लीजिए। कार्यक्रम संयोजक एसके अटारिया ने कहा कि आओगे कभी जो अभी जा रहे हो, तुम बेकार में मेरे सर की कसम खा रहे हो। षायर साजिद अमन ने कहा पीठ पीछे जो बार करते है, कैसे कहूं वो प्यार करते है । विजय भार्गव ने कहा कि आर्दषों की बात आज के युग में ठकुर सुहाती है, राम राज्य की कल्पना में उम्र गुजर जाती है, जिनके हाथ चिराग होना था, उनके हाथ गोले है। कवि राकेष सिंह ने कहा पहन कुर्ता पर पतलून आधा फागुन आधा जून, उुंची नीची डगर है गांव की मोच आए न तेरे पांव में। दिनेष वषिश्ठ ने काव्य पाठ करते हुए कहा कि मुझको अष्कों के समंुदर में डुबोने वाले, याद कर लेंगे तो रोएंगे जमाने वाले, मैं किसी अजनबी बस्ती में चला आया, अब नही मिलते मुझे जख्म लगाने वाले। कवि व लेखक अरूण अपेक्षित ने तंबाकू निशेद दिवस पर पाठ करते हुए कहा िकइस बात को समझना डायन षराब, बोतल में बंद रखना डायन षराब को। डॉ लखनलाल खरे ने काव्य पाठ करते हुए कहा बगुले काले कोट पहने, लड रहे मुकदमा मछली का, मांग रहे तन रोज फीस का अपनी पिछली पेषी का । प्रदीप अवस्थी ने कहा तेरे चाहत में यूं इक दिन बिखर जाउंु, मोहब्बत कर तो लूं लेकिन । टूटे हुए ख्वाबों ने षोर कर दिया, ज्यों दिल से गुजरा हो बारात लेकर । सत्तार षिवपुरी ने काव्य पाठ करते हुए कहा कि इत, उत मत भटकत फिरतदेवे डेरो डाल, किस्मत ख्ुाद ही ल ेले फिरे तुम्हरी रोटी डाल । रामकृश्ण मोहंत ने कहा कश्ट में भी मुुस्कराना आ गया, राग उल्फत गुनाना आ गया, कद्र करते नहीं मां बाप की देखों कैसा जमाना आ गया। काव्य गोश्ठी का आभार संयोजक एसके अटारिया ने किया। इस मौके पर मुकेष आचार्य, आषीश जैन, भगवती प्रसाद कबीर, विजय षर्मा सहित बडी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।






